मानव अभ्यास दर्शन
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मानव अभ्यास दर्शन
-15
विकल्प
-10
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
-1
प्राक्कथन
1
1. अभ्यास दर्शन
2
2. अभ्यास की अनिवार्यता
14
3. अभ्युदय की अनिवार्यता
18
4. अखण्ड समाज गति सहज सामाजिकता की अनिवार्यता
22
5. सामाजिकता का अध्ययन
24
6. सामाजिकता का आचरण
30
7. स्थापित मूल्यों की अनिवार्यता सर्वदा सबके लिए समान है।
32
8. जनाकाँक्षा को सफल बनाने योग्य शिक्षा व व्यवस्था
37
9. समाज व्यवस्था
54
10. मानव संस्कृति
57
11. व्यक्तित्व एवं प्रतिभा का संरक्षण ही अर्थ का संरक्षण है।
64
12. न्याय पाना, सही कार्य व्यवहार करना एवं सत्य सम्पन्नता ही साम्यत: जनाकाँक्षा है।
66
13. सतर्कता सजगता पूर्ण परंपरा में मानवीयता सहज चरितार्थता स्वभाव सिद्ध है।
69
14. भ्रमित मानव समुदाय की प्रथम अवस्था भय प्रलोभन है।
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15. लाभ उत्पादन नहीं है।
75
16. विनिमय क्रिया जागृत मानव परंपरा में अनिवार्य प्रक्रिया है।
76
17. ईश्वर तंत्र पर आधारित राज्य नीति एवं धर्म नीति रहस्यता से मुक्त नहीं है।
78
18. प्रत्येक मानव इकाई भ्रम, भय, रहस्य मुक्ति के लिए प्रयासरत है।
81
19. आचरणपूर्णता पर्यन्त शिक्षा में गुणात्मक परिवर्तन का अभाव नहीं है।
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20. केवल साधनों की प्रचुरता मानवीयता को स्थापित करने में समर्थ नहीं है।
91
21. विकास व जागृति ही वैभव क्रम है।
93
22. प्रत्येक मानव समाजिकता के लिए समर्पित होना चाहते है।
95
23. कम्पनात्मक एवं वर्तुलात्मक गति का वियोग नहीं हैं।
96
24. सर्वशुभ उदय का भास-आभास संवेदनशीलता की ही क्षमता है और प्रतीति व अनुभूति संज्ञानीयता की महिमा है।
98
25. आवेश मानव का अभीष्ट नहीं है।
100
26. मानव में संचेतनशीलता ही संस्कार एवं जागृति सम्पन्नता सहज आधार एवं प्रमाण है।
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27. सामाजिकता का आधार संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था ही है।
108
28. जिज्ञासात्मकता सुखी होने के अर्थ में एवं आवेशात्मक क्रियाकलाप के फलस्वरूप पीड़ाएं प्रसिद्ध हैं।
110
29. मानव में न्यायापेक्षा, सही करने की इच्छा और सत्य वक्ता होना जन्म से ही दृष्टव्य हैं।
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30. मानव में अखण्डता के लिए मानवीयता ही एकमात्र शरण है।
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31. मानवीयतापूर्ण जीवन में, से, के लिए सुसंस्कारों का अभाव नहीं है।
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32. संस्कार ही संस्कृति को प्रकट करता है।
130
33. केवल उत्पादन ही मानव के लिए जीवन सर्वस्व नहीं है।
136
34. मानव के संपूर्ण संबंध गुणात्मक परिवर्तन के लिए सहायक हैं।
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35. कुशलता, निपुणता एवं पाण्डित्य ही ज्ञानावस्था की मूल पूंजी है।
143
36. समाधान, समृद्धि, अभय एवं सहअस्तित्व में अनुभव मानव धर्म की चरितार्थता है।
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37. व्यक्ति का व्यक्तित्व न्याय प्रदायी क्षमता से प्रदर्शित है।
149
38. संपूर्ण अध्ययन अनुभूति, समाधान, सहअस्तित्व एवं समृद्धि के लिए ही है।
154
39. मानव का संपूर्ण कार्यक्रम धार्मिक, आर्थिक एवं राज्यनीति में, से, के लिए है।
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40. पाण्डित्य ही मनुष्य में विशिष्टता हैं।
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41. समाज संरचना का आधार “मूल्य त्रय” ही है।
165
42. भोगों में संयमता से अभयता पूर्ण जीवन प्रत्यक्ष होता है।
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43, समस्त प्रकार के वर्ग की एकमात्र समाधान स्थली मानवीयता ही है।
175
44. अभयता का प्रत्यक्ष रूप ही वर्तमान में विश्वास है।
178
45. आवेश (लाभोन्माद, भोगोन्माद, कामोन्माद) मानव की स्वभाव गति नहीं है।
181
46. प्रत्येक स्थिति में किए गए अभ्यास का प्रत्यक्ष रूप ही व्यवहार एवं व्यवस्था है।
183
47. व्यक्तित्व और प्रतिभा की चरमोत्कर्षता में ही प्रेमानुभूति होती है।
187
48. उत्पादन एवं व्यवहारिकता अखण्ड समाज में, से, के लिए अपरिहार्य है।
190
49. प्रमाण त्रय ही विश्वास है।
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50. मानव में स्थूल, सूक्ष्म व कारण भेद से क्रियाशीलता प्रसिद्ध है।
195
51. अभ्यास समग्र की उपलब्धि क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता ही है।
198
52. अमानवीयता से ग्रसित वर्ग संघर्ष की सीमा में प्रलोभन व भय का अभाव नहीं है।
200
53. मानव जीवन में भक्ति जागृति के अर्थ में वांछित प्रक्रिया है।
202
54. योगाभ्यास जागृति के अर्थ में चरितार्थ होता है।
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