प्रणेता संदेश

व्यापक शून्यावकाश में स्थित अनन्त ब्रह्माण्डों में से एक ब्रह्माण्ड के अंगभूत इस पृथ्वी पर, वर्तमान में पाये जाने वाले मानव अत्यंत सौभाग्यशाली है, क्योंकि उनको ह्रास और विकास का अध्ययन एवम् प्रयोग करने का स्वर्णिम अवसर व साधन प्राप्त है।

अभ्युदय (सर्वतोमुखी विकास) सबको सर्वत्र उत्प्रेरित कर रहा है कि –

“स्वयम् का मूल्यांकन कर लो – गलती अपराध नहीं करोगे, फलत: दुःखी, प्रताड़ित और दरिद्र नहीं होगे I”

स्वयम् का मूल्यांकन करने के लिये स्वयम्-सिध्द मूलभूत आधार ह्रदयंगम करना होगा, वह है –

भूमि एक – राष्ट्र अनेक,

मानव की जाति एक – कर्म अनेक,

मानव का धर्म एक – मत अनेक,

  • ईश्वर एक – देवता अनेक
  • स्व-मूल्यांकन के लिये निम्न बिन्दुओं से अर्थात् –
  • एक. प्रत्येक मनुष्य मानव मात्र को एक इकाई के रूप में जानने और उसके साथ तदनुसार निर्वाह कर सके – ऐसी क्षमता, योग्यता और पात्रता के विकास के लिए,
  • दो. सह-अस्तित्व, सन्तुलन, समाधान, अभय और सुख की अक्षुण्णता के लिए,

तीन. स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष तथा दया पूर्ण जीवन दृढ़ता पूर्वक जीने में समर्थ होने के लिए,

चार. अमानवीयता से मानवीयता और मानवीयता से अतिमानवीयता की ओर गति के लिए, सुगम मार्ग पाने के लिए,

  • पांच. सामाजिक दायित्वों का सहजता पूर्वक निर्वाह करने के लिए,
  • छ. आशित मानवीय संस्कृति एवम् सभ्यता के ज्ञान के लिए,
  • सात. राष्ट्र में संस्कृति एवं सभ्यता के विकास के लिए आवश्यक विधि एवम् व्यवस्था के नीति पक्ष की जानकारी के लिए
  • इनके आधारभूत तथ्यों का अध्ययन आवश्यक है। पूर्ण विश्वास है कि सांकेतिक तथ्यों का अध्ययन करने के पश्चात् यह ग्रन्थ आपके व्यवहार एवं आचरण में मानवीयता-पूर्ण दृष्टि, गुण व विषयों को प्रस्थापित करने की प्रेरणा देगा एवम् आपके व्यक्तित्व के विकास में सहायक होगा।
  • ए. नागराज (व्य.द. 1978)
Page 1 of 335
-2 -1 1 2 3 4 5 6 7