प्रस्तावना

1. राष्ट्रीय चरित्र: विगत का अवलोकन तथा विकल्प की आवश्यकता

विगत का अवलोकन

सुदूर विगत से आज पर्यन्त विभिन्न संस्कृतियां एवं सामाजिक व्यवस्थाएँ अपनी-अपनी भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर निर्मित हुई और मौलिक रुप में भौतिक एवं अधिभौतिक चिंतन पर आधारित रही है। इसी चिंतन के आधार पर उनकी धार्मिक, आर्थिक एवं राजनैतिक प्रणालियाँ निर्मित एवं विकसित हुई। वर्तमान में अपने समस्त साधनों से सम्पन्न होकर ये संस्कृतियाँ अथवा सामाजिक व्यवस्थाएँ परस्पर सम्पर्क में आई। परिणाम स्वरुप प्रत्येक संस्कृति एवं व्यवस्था की अपनी श्रेष्ठता एवं उपादेयता के प्रतिस्थापन-क्रम में पारस्परिक संघर्ष पूर्वक दलन, दमन एवं शोषण की कूटनीति को वर्तमान राजनीति का रुप समझा जा रहा है। यही अंतर्द्वंद्व अथवा अंतर्विरोध भयंकर उथल-पुथल एवं तृतीय विश्वयुद्ध की संभावनाओं से गर्भित है।

  • युद्ध अथवा युद्ध की मानसिकता मानव विकास के लिये कभी भी सहायक सिद्ध नहीं हुई है। इससे जन-समूह भयाक्रांत होकर व्यक्ति केन्द्रित अथवा व्यक्तिपरक विचारों में सीमित साथ ही सामाजिकता के चिंतन से विमुख होता गया जबकि सामाजिकता ही निर्भयता अथवा निर्भयता ही सामाजिकता है।
  • अतीत में धर्मप्रधान एवं अर्थप्रधान राजनैतिक व्यवस्थाओं के प्रयोग अपनाये गये थे। धर्मप्रधान राजनीति के मूल में पाप-पुण्य तथा स्वर्ग-नरक के भय एवं प्रलोभन मुख्य तत्व रहे हैं। इसी प्रकार अर्थप्रधान राजनीति पूंजीवादी एवं साम्यवादी व्यवस्था प्रणाली से प्रभावशील हुई। इन दोनों के लक्ष्य वर्ग एवं अतिभोग अथवा बहुभोग ही रहे हैं।
  • इस प्रकार अतीत के भय और प्रलोभन के रहस्य पर आधारित धर्म प्रधान व्यवस्थायें न तो मानव को निर्भ्रम व निर्भ्रांत बना सकी और न उसे समृद्धि, समाधान एवं सुख की निरन्तरता ही प्रदान कर सकी। अतिभोग एवं बहुभोग वाली अर्थ प्रधान व्यवस्थायें भी मानव को जीवन मूल्य एवं समाज मूल्य से समृद्धि नहीं बना सकी । फलतः सशंकता, भय, निराशा एवं कुण्ठा की अभिवृद्धि हुई।
  • भौतिकवादी व्यवस्था की असफलता
  • अनेक सम्प्रदाय, वर्ग, जाति, मत आदि के आधार पर स्थापित समझौतावादी वर्ग भावना से सम्बद्ध समाज कहलाने वाली इकाईयां मानव के लिए समाधान, समृद्धि, अभय एवं सहअस्तित्वपूर्ण सार्वभौमिक सामाजिकता राष्ट्रीयता को विकसित करने में समर्थ नहीं रहीं। फलस्वरुप प्रत्येक देश असमाधान, संशकता, भय एवं सह अस्तित्व विहीनतावश दिग्भ्रमित होकर सम्पूर्ण मानव के विनाश हेतु शस्त्र भंडार या निर्माण करने के लिये हठ एवं होड़ सहित प्रयास रत है। वर्तमान में प्रधानतः युद्ध निपुणतापूर्ण युद्ध सामग्रियों के निर्माण एवं संग्रह करने में जो देश समृद्ध है उसी देश को मनुष्य ने विकसित देश कहा। क्या
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