उपयोगिता सहज प्रवृत्ति, कार्य और प्रयोजन ऊपर कहे हुए तथ्यों के आधार पर स्पष्ट हो चुकी है और उक्त विश्लेषणों से और तथ्यों को निर्देशित करने के प्रयासों से यह भी स्पष्ट हुई है कि मानव में, से, के लिए अर्थशास्त्र का अध्ययन है। मानव का सार्थक स्वरूप समाधान, समृद्धि, अभय और सहअस्तित्व एवं उसकी निरंतर गति ही है। मानव परंपरा का नित्य गरिमा और महिमा स्वरूप अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था ही है। इन्हीं में भागीदारी प्रत्येक व्यक्ति में, से, के लिए दायित्व और कर्तव्य रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है। यही प्रत्येक मानव वर्तमान में विश्वासपूर्वक जीने की कला है। अतएव यही निष्कर्ष सुस्पष्ट है स्वयं व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के क्रम में ही अर्थशास्त्र का चिंतन होना, अध्ययन होना और जिसका लोकव्यापीकरण होना मानवीयतापूर्ण मानव परंपरा के लिए अनिवार्य स्थिति है। मानव से सम्पादित होने वाली अर्थात अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन के रूप में व्यक्त होने वाले संपूर्ण व्यवहार कार्यकलाप, जीने की कला है। ऐसे जीने की कला में उपयोगिताएं आवश्यकता के आधार पर प्रसवित होता है। प्रसवित होने का तात्पर्य स्वयं से, स्वयं में, स्वयं के लिए स्फूर्त होने की क्रिया से है।

संपूर्ण आवश्यकतायें परस्परता क्रम में ही आशा, विचार, इच्छा ऋतम्भरा और प्रामाणिकता के रूप में प्रमाणित होती है। अभी तक जितने भी आवश्यकताओं का बोध हुआ है सकारात्मक पक्ष में आहार, आवास, अलंकार, दूरश्रवण, दूरदर्शन, एवं दूरगमन संबंधी वस्तुएं हैं। यही सब अथ से इति तक मात्रा और गुणवत्ता सहित उत्पादन का सूत्र है। इसके लिए सम्पूर्ण सूत्र मानव से ही प्रतिपादित हुई है। वस्तुओं को संग्रह, भोग, अतिभोग की ओर प्रयोग करने का कार्य मानव विगत कई शताब्दियों से करता आया है। इसके लिए लाभोन्मादी अर्थ चिंतन को ‘धन का विज्ञान’ के नाम से लोक व्यापीकरण किया। ऐसा लाभोन्मादी अर्थ चिंतन समाज-रचना और व्यवस्था का आधार बिन्दु नहीं बना अपितु संघर्ष का आधार बना। संघर्ष विधि से संपूर्ण वस्तुओं का अपव्यय होना भावी हो गया। इसी कारणवश मानव शुभ चाहते हुए अशुभ के लिए प्रवर्तनशील होने विवश रहा। और संघर्ष को अपना लिया।

भ्रमित रहने की विवशता फलस्वरूप लाभोन्मादी, भोगोन्मादी और कामोन्मादी प्रवृत्तियों में ग्रसित होना पाया जाता है। इन्हीं उन्मादों की ओर प्रवर्तित करने की क्रियाकलापों को विद्वता, कलाकारी, किंवा नेतृत्व भी मान लिया गया है। अस्तु, व्यक्ति में अंतर्विरोध, उसका स्रोत सुस्पष्ट होने के उपरान्त परिवार में अंतर्विरोध, मतभेद और द्वेष के रूप में; समुदायों की परस्परता में मतभेद विवाद और संघर्ष में ग्रसित रहना हम देख चुके हैं, सर्वविदित है। इसीलिए उपयोगिता, सदुपयोगिता, प्रयोजनशील विधियों का अध्ययन आवश्यक और अनिवार्य बन चुकी है।

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