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अभ्यास दर्शन
जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति के आधारभूत परमात्मा में स्मरण करते हुए “अभ्यास दर्शन” का विश्लेषण करता हूँ।
सम्पूर्ण क्रियायें सत्ता (व्यापक) में सम्पृक्त जड़ और चैतन्य ही है।
चैतन्य अवस्था में ही क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता की संभावना आवश्यकता है जिसके लिए मानव में अभ्यास की अनिवार्यता है। अनुमान क्षमता ही अभ्यास का आधार है। अनुभव से अधिक उदय ही अनुमान है। यही निरन्तर अभ्यास सूत्र है।
अभ्युदय (सर्वतोमुखी समाधान) ही अभ्यास की प्रत्यक्ष उपलब्धि और प्रमाण है।
ज्ञानावस्था की निर्भ्रम इकाई में व्यापक सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति अविभाज्य है, यही सहअस्तित्व में अनुभव ज्ञान एवं प्रकृति दर्शन प्रसिद्ध है। यही अभ्युदय पूर्णता है, साथ ही मानव की चिरवाँछा भी इसलिए किसी न किसी अंश में प्रत्येक मानव में व्यापक सत्ता में अनुभूति एवं प्रकृति की व्यंजना सहज अधिकार (व्यंजना = रूप, गुण, स्वभाव सहज अधिकार एवं धर्म ग्राही व प्रदायी क्षमता सम्पन्न रहना) प्रसिद्ध है। यही अभ्युदय की स्पष्ट संभावना है।
व्यंजनीयता ही दर्शन क्षमता एवं अनुभव ही आनन्द है।
व्यंजनीयता एवं व्यंजनीत्पादीयता ही संवेदना हैं।
व्यंजनीयता ही अभ्युदय की कामना का आधार है। मन, वृत्ति, चित्त एवं बुद्धि में ही व्यंजित होने, व्यंजित करने की क्षमता व प्रक्रिया पाई जाती है। यही संस्कार व विचार क्षमता है।
चैतन्य इकाई में ही संचेतना को प्रकट करने की योग्यता है, जबकि यह योग्यता रासायनिक (जड़) क्रियाकलाप में नहीं है।
अभ्युदय की कामना चैतन्य इकाई में पायी जाती है। यह कामना ज्ञानावस्था में ही विशेषत: पायी जाती है। ज्ञानावस्था की चैतन्य इकाई में ही अभ्यास के प्रति निष्ठा एवं लक्ष्य के प्रति जिज्ञासा रहती है।