भागीदार होना अतिथि के रूप में स्वीकार्य जागृत मानव परंपरा में कोई व्यक्ति बिना आमंत्रित अथवा बिना प्रयोजन के किसी के परिवार में जाने की आवश्यकता ही नहीं रह जाता है। हर मानव परिवार विधि से आमंत्रित अथवा संयोजित रहना बन पाता है और सभा विधि से संयोजित और प्रयोजित कार्यार्थ ही एक दूसरे के अतिथि होना पाया जाता है। अतिथि का तात्पर्य ही आमंत्रणपूर्वक सहभोज करना। इस प्रकार से रोटी और बेटी का संबंध विशालता क्रम में सार्थक होना दिखाई पड़ता है। यह सार्थकता परिवार मानव विधि से और व्यवस्था मानव विधि से सम्पन्न होना जागृत परंपरा सहज मानव में, से, के लिये एक शिष्टता पूर्ण गति है। इस प्रकार धर्म, राज्य व्यवस्था सभा और परिवार विधि से व्यवस्था के रूप में संबंधित होने जिसके व्यवहारान्वयन क्रम में रोटी और बेटी का एकरूपता अथवा विशालता अपने आप स्पष्ट हो चुका है। अतएव जागृत मानव परंपरा में उक्त चारों विधाओं में अर्थात् रोटी, बेटी में एकता और राज्य और धर्म में एकता का अनुभव होना हर व्यक्ति के लिये आवश्यक है। इसका अभिव्यक्ति हर मानव का, मानव परिवार का मौलिक अधिकार है। इन्हीं मौलिक अधिकारों को प्रमाणित करने के क्रम में ही सभी मानव अपने आप को इन चारों विधाओं में स्वयंस्फूर्त विधि से अर्थात् जागृति पूर्वक गतिशील होने मानव सहज प्रवृत्ति है।
6. व्यवस्था संबंध :- व्यवस्था में जीने का प्रमाण परिवार में होता है। समग्र व्यवस्था में भागीदारी सहज क्रम में व्यवस्था संबंध को पहचानने की आवश्यकता उत्पन्न होती है। जैसा परिवार में न्याय-सुरक्षा का प्रमाण संबंध, मूल्य, मूल्यांकन तन, मन, धन का सदुपयोग-सुरक्षा विधि से प्रमाणित हो जाता है। यही परिवार मानव का मानवीयतापूर्ण परिवार का परिभाषा है। इसीलिये परिवार में परस्पर हुई पिता-पुत्र, भाई-बहन, मित्र, गुरू, शिष्य, पति-पत्नी, माता-पिता इन संबंधों में संबोधन सहज संबध चिन्हित होता है और उत्पादन-कार्य में भागीदारी प्रमाणित रहता ही है। हर परिवार में वस्तुओं का उपयोग, सदुपयोग भी साक्षित रहता है। विनिमय-कार्य के लिये और विशाल संबंध की आवश्यकता बनी रहती है। एक परिवार की आवश्यकता जितने प्रकार की वस्तुओं की बना रहता है उनमें से कुछ वस्तुओं को किसी भी परिवार में उत्पादित होना स्वाभाविक है विनिमयपूर्वक एक परिवार में उत्पन्न वस्तु को दूसरे परिवार प्राप्त कर लेना ही वस्तुओं का आदान-प्रदान का तात्पर्य है। इस विधि से विनिमय एक आवश्यकीय क्रियाकलाप है; यह स्पष्ट हो जाता है। व्यवस्था के आयामों में विनिमय एक आयाम है। व्यवस्था रूप में ही संपूर्ण आयाम सहित परंपरा स्पष्ट होती है यथा मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार परंपरा अन्य सभी चार आयामों के लिये स्त्रोत और संतुलन सूत्र होना पाया जाता है। प्रत्येक आयाम में मानव अपने