अध्याय - 9

समाज और विधि

पूर्णता के अर्थ में स्वत्व, स्वतंत्रता, उपकार संयुक्त रूप से वैभव संपन्न परंपरा है :-

विधि का कार्यरूप नियम और न्याय सम्मत विधि से किया गया कार्य-व्यवहार है। नियम और न्याय में नित्य संगीत ही समाधान के रूप में होना ख्यात है। मूलतः विधि अपने सूत्र रूप में नियम और न्याय ही है। नियमों को तीन प्रकार से पहले वर्णित कर चुके हैं। न्याय को संबंध, मूल्य, मूल्यांकन, उभयतृप्ति संतुलन के रूप में स्पष्ट किया गया है। संबंधों को मानव संबंध और नैसर्गिक संबंध के विधि से प्रस्तुत किया जा चुका है। नियम और न्याय सूत्र में, से मानव संबंधों में न्याय प्रधान नियम और नैसर्गिक संबंधों में नियम प्रधान न्याय का अनुभव मानव सहज रूप में किया जाना जागृति का द्योतक है।

मानव संबंधों को सात प्रकार से नाम सहित प्रयोजनों को इंगित कराया है। संबंध क्रम से पोषण, संरक्षण, अभ्युदय, जागृति, प्रामाणिकता, जिज्ञासा, यतित्व, सतीत्व, विकास-प्रगति, दायित्व-कर्तव्य प्रयोजनों का स्वरूप है। इन प्रयोजनों के अर्थ में हर संबंधों का कार्यकलाप साक्षित होना ही विधि है। दायित्व और कर्तव्य के संबंध में व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी, परिवार और समाज में भागीदारी एक आवश्यकीय स्थिति और गति होना स्पष्ट किया जा चुका है। यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि दायित्व और कर्तव्यों के साथ ही मौलिक अधिकारों का प्रयोग सार्थक होता है। जितने भी प्रयोजन है वह सब मानव कुल में ही प्रमाणित होता है। वह 1. माता-पिता, 2. भाई-बहन, 3. गुरू-शिष्य, 4. मित्र, 5. पति-पत्नी, 6. स्वामी (साथी)-सेवक (सहयोगी), 7. पुत्र-पुत्री। इस प्रकार से 7 संबंध। इसमें से पति-पत्नी संबंधों को छोड़कर बाकी सभी संबंध पुत्र-पुत्रीवत्, माता-पितावत्, गुरूवत्, शिष्यवत्, मित्रवत्, भाई-बहिनवत्, स्वामी-सेवकवत् के रूप में पहचाना जाना सहज है। इसमें सर्वाधिक अथवा विशाल रूप में होने वाले प्रतिष्ठा को मित्र के रूप में पहचाना जाना स्वाभाविक है।

इन सभी संबंधों के साथ सार्थकता अथवा प्रयोजनों की अपेक्षा परस्पर स्वीकृत रहा करता है जैसा – माता, पिता से अपेक्षा जागृति, प्रामाणिकता सहित समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व का होना प्रत्येक संतानों में अपेक्षित-प्रतीक्षित रूप में मिलता है। हर संतान के साथ माता-पिता

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