1. जन्म संस्कार उत्सव - मानव परंपरा में हर माता-पिता संतान प्राप्ति के साथ अपने में गौरव और सम्मान का अनुभव करना और होना पाया जाता है। इसी सम्मान और गौरव के समर्थन में उत्सव का स्वरूप बनता है। उत्सव में उत्साह और प्रसन्नता मूल स्रोत है। किसी उद्देश्य, किसी प्रयोजन, किसी वस्तु प्राप्ति के अर्थ में ही उत्साह-प्रसन्नता का प्रमाण मानव कुल में सफलता के अर्थ को प्रतिपादित करता है। जैसे - एक पति-पत्नी की कोख से संतान प्राप्ति अपने आप में शरीर संबंध का फलन के रूप में होना देखा गया है। हर मानव शरीर और जीव शरीरों की रचना गर्भाशय में ही होना देखा गया है। अत्याधुनिक संसार में भी इसके लिये कई कृत्रिम उपायों को खोजा गया है। सफलता अभी भी विचाराधीन है। कृत्रिम विधि यदि सफल भी होता है तो इसकी सफलता में भी गर्भाशय सहज सटीक वातावरण को कृत्रिम रूप में निर्मित करने के उपरान्त ही सफल होने की व्यवस्था है।
ऐसे कृत्रिम गर्भाशय संरचना वातावरण संबंधी कृत्यों को समान करने के लिये जितना श्रम, जितना वस्तु, जितना समय लगता है, लग सकता है वह सर्वाधिक निरर्थकता अपव्यय के खाते में जायेगा। अस्तित्व में यही सिद्धान्त है जो जिसको अपव्यय करेगा उससे वह वंचित हो जायेगा। कृत्रिम गर्भाशय निर्माण विधि स्वयं अपव्ययता के आधार पर ही मानव मन में कल्पित हो पाता है। इस अपव्ययता क्रम में स्वाभाविक सार्थक नियति सहज विधि से रचित शरीर रचना के अंगभूत गर्भाशय की आवश्यकता, विशेषकर मानव शरीर में गर्भाशय की आवश्यकता एवं तत्संबंधी उत्सव से मानव वंचित होना भावी हो जाता है। इससे यह पता लगता है कि इस मुद्दे पर कृत्रिम उपायों की निरर्थकता का हर सामान्य मानव स्वीकार कर सकता है। अतएव प्रकृति सहज स्त्री-पुरूष शरीर रचना उसका सम्पूर्ण अंग-अवयवों का उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनीयता क्रम में शरीर स्वस्थता और जीवन स्वस्थता रूपी संयमता के संयोगपूर्वक ही विधिविहित कार्यकलापों में प्रवृत्त होना पाया जाता है। यह जीवन जागृति पूर्वक ही सफल होना देखा गया है। ऐसा जीवन जागृति मानवीयता पूर्ण शिक्षा-संस्कार परंपरा पूर्वक सर्व सुलभ होने के तथ्य स्पष्ट हो चुका है।
संतान जन्मोत्सव के अवसर पर जागृत मानव परंपरा सहज जीवन जागृति की कामना, शरीर स्वस्थता की कामना इसके पुष्टि पोषण विधाओं का चर्चा-संवाद, गीत, गायन, नृत्य आदि कृत्यों से उत्सव समारोह को सफल बनाना इन्हीं कृत्यों से हर माता-पिता में संतान प्राप्ति के महत्वपूर्ण घटना के आधार पर सम्मान और गौरव का उमंग की पुष्टि बन्धुजन, बहुजन द्वारा सम्पन्न होता है। यही जन्म संस्कार उत्सव का तात्पर्य है। इससे स्पष्ट हो गया कि शैशवता की स्थिति में अभिभावक