विधि से निपुणता-कुशलता उत्पादन कार्य के मूल में होना और उसका उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनशीलता स्पष्ट होता है। आवश्यकता के आधार पर तकनीकी निपुणता, कुशलता और सम्भावनाओं सहित कार्यकलाप सम्पन्न होना देखा गया है। इस क्रम में पीढ़ी से पीढ़ी समृद्धि होता ही आया है। मूलत: विरोधाभास जो कुछ भी निर्मित हुई ईंधन नियोजन, रासायनिक द्रव्यों का नियोजन, उसके उत्पादनों में होने वाली विसर्जन प्रणालियों से विसंगतियाँ निर्मित हुआ, जिसको प्रदूषण के नाम से इंगित करते हैं। दूसरा विसंगति विनिमय प्रणाली में उत्पादक और उपभोक्ता के बीच में दूरी लाभ के रूप में बढ़ता जाना रहा है। इन्हीं दो विसंगतियों के चलते इनसे संबंधित सभी उथल-पुथल होना अर्थात् अवांछित घटनाएँ होना रहा हैं।

उत्पादन कार्य में मानसिकता, स्वस्थ शरीर और हस्तलाघव सहित श्रम नियोजित होता ही है। जहाँ तक साधन की बात है, अर्थात् इसके पहले से जो वस्तुएँ निर्मित हो चुकी हैं, पुन: उत्पादन कार्य के लिए उपयोगी है। यह पीढ़ी से पीढ़ी प्रदत्त होते हुए आया है। इस प्रकार हर पीढ़ी के बाद साधन सम्पन्न होने के क्रम से पीढ़ी से पीढ़ी समृद्ध होना स्वाभाविक है। यह परिवारमूलक विधि से ही सर्वसुलभ हो पाता है। हर परिवार में आवश्यकता व उत्पादन, उपयोग, सदुपयोग, विनिमय ये सभी अवयव कार्य-व्यवहार के रूप में होना स्वाभाविक है। इन्हीं कार्य-व्यवहारों में समृद्धि का अनुभव एक लक्ष्य है। इसी लक्ष्य को प्रत्येक परिवार पाने के क्रम में निश्चित उत्पादन का योजना, स्वरूप स्थापित होता ही है। यही व्यवस्था का मूल तत्परता है। परिवारगत आवश्यकता से अधिक उत्पादन से ही समृद्धि का अनुभव होना स्वाभाविक है।

आवर्तनशीलता के स्वरूपों को सहज ही हम इस प्रकार देख सकते हैं कि उत्पादन के लिए आवश्यकता, आवश्यकता के अनुरूप मानसिकता जो निपुणता, कुशलता और पांडित्य सम्पन्न मानसिकता, स्वस्थ शरीर के द्वारा प्राकृतिक ऐश्वर्य पर श्रम नियोजन पूर्वक वस्तुओं में कला मूल्य और उपयोगिता मूल्य की स्थापना, उपयोगिता मूल्य के अनुरूप उसका सदुपयोग, फलत: आवश्यकता की आपूर्ति, शेष का विनिमय। इस प्रकार समृद्धि का अनुभव सूत्र स्पष्ट होता है।

उत्पादन कार्यों के गति में जो ईंधनों को संयोजित किया जाता है इसमें आवर्तनशीलता को पहचानना अनिवार्य है। इन्हीं में जो कुछ भी अभी समीचीन प्रदूषण का संकट है इसमें मुख्य तत्व कोयला और खनिज तेल से मुक्त ईंधन विधि और प्रकाश विधियों को संजो लेना ही ईंधन संबंधी आवर्तनशीलता का तात्पर्य है। इसके मुख्य स्रोत का अधिकांश भाग मानव मानस में आ ही चुका है जैसा सूर्य ऊर्जा, प्रपात बल, हवा का दबाव, प्रवाह शक्ति पर, गोबर कचरा से उत्पन्न ईंधन। इन सभी ओर ध्यान जा ही रहा है कि खनिज कोयला और तेल के बाद क्या करेंगे? इसके उत्तर में सोचा गया है। खनिज कोयला और तेल से ही

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