मानव में आंकलित है। इनके अतृप्ति वश ही बारंबार परिवर्तन का प्रयास, इच्छा, विचारपूर्वक प्रयोग किया है। इन सभी प्रयोगों का चाहे वह आदिकाल से हो, प्राचीनकाल से हो, अर्वाचीन काल से क्यों न हो और आधुनिक, अत्याधुनिक काल क्यों न हो, इन सभी समय में किया गया सम्पूर्ण क्रियाकलाप का परिणाम वर्तमान में ही आंकलित होना, मूल्यांकित होना देखा जाता है। अत्याधुनिक कहलाने वाले सीमा में किए गए क्रियाकलापों के उपरांत भी पुनः परिवर्तन की अपेक्षा बेहतरीन जिंदगी की अपेक्षा सार्वभौम शुभ की स्वीकृति के साथ-साथ आज भी मूल्यांकित होता है। इसलिए सार्वभौम व्यवस्था अखण्ड समाज की ओर ज्ञान, दर्शन, विचार, शास्त्र और योजना की ओर अनुसंधान, अध्ययन आवश्यक होना पाया जाता है।

परिवर्तन के क्रम में ही मूल्य मूलक, लक्ष्य मूलक विधि से जीने की कला, विचारशैली और अनुभव बल के साथ जीना मानव संस्कारानुषंगीय इकाई होने का प्रमाण है। संस्कार मूलत: पूर्णता और उसकी निरंतरता के अर्थ में किया गया सम्पूर्ण कार्यकलाप विचार विविध दर्शन और ज्ञान सहज प्रामाणिकताएँ हैं। ज्ञान और दर्शन विधाओं में पारंगत और प्रमाणित होना अनुभवमूलक विधि से ही होता है। अनुभव क्षमता प्रत्येक मानव में होने वाले जीवन सहज कार्यकलापों में से सर्वोपरि वैभव है।

सर्वशुभ समझदारी से ही है।

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