स्वतंत्रता है। यही मानव कुल में संप्रभुता और प्रभुसत्ता के रूप में वैभवित होना जिसकी सार्वभौमता सर्व स्वीकार होना सहज है। इसी तथ्य के आधार पर सर्वशुभ योजना समीचीन है। सर्वशुभ सम्पन्न होने का अधिकार, स्वत्व, स्वतंत्रता हर मानव में, से, के लिए समीचीन रहना पाया जाता है। ऐसा सर्वशुभ समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व में अनुभव सहज प्रमाण ही है। इसे सर्वसुलभ करने के क्रम में ही हर व्यक्ति, हर परिवार प्रमाणित होने का अवसर, आवश्यकता विद्यमान है ही। इसी विधि से हम मूल्य मूलक प्रणाली से योजना और कार्य शैलियों को पाना सहज है। यही मानवीयतापूर्ण विधि से जीने की कला का स्वरूप है।
अस्तु मूल्य मूलक, लक्ष्य मूलक विधि से प्रत्येक मानव व्यवस्था में जीना और व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करना सहज और आवश्यक है यह स्पष्ट है। अतएव मानव अपने में व्यवस्था विधि स्वीकृति के लिए सम्पूर्ण मूल्यों का स्रोत जीवन सहज अक्षय शक्ति, अक्षय बल ही हैं।
उक्त चित्रण से यह स्पष्ट है कि समझदारी स्वयं स्फूर्त होता है। मानव शरीर को संचालित करने वाला जीवन सहज शक्ति और बल मानव कुल में, मानव कुल का तात्पर्य शरीर रचना के आधार पर है, मानव शरीर के द्वारा जीवन ही सम्पूर्ण मूल्यों को प्रमाणित करता है, निर्वाह करता है और मूल्यांकित करता है। तृप्ति पाने की इच्छा से ही यह सब कार्यों को करता है। जीवन तृप्ति समाधान-समृद्धि पूर्वक, सुख, शांति, संतोष रूप में ख्यात हो पाता है और प्रामाणिकता पूर्वक सर्वतोमुखी समाधान रूपी ज्ञान, दर्शन, विवेक, विज्ञान सम्पन्न विचार शैली और जीने की कला सम्पूर्ण प्रमाण का आधार होना पाया जाता है।
मूलत: अर्थ का स्वरूप तन, मन, धन के रूप में देखा गया है। धन केवल उत्पादित वस्तु ही है। प्राकृतिक ऐश्वर्य पर ही मानव सहज श्रम का नियोजन होना भी सुस्पष्ट हो चुका है। इसी के परिणाम स्वरूप सामान्याकाँक्षा, महत्वाकाँक्षा संबंधी वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं, यही प्रतिफल का स्वरूप है।
श्रम नियोजन का प्रतिफल ही विनिमय के लिए वस्तु है। इन्हीं विनिमय विधि में श्रम मूल्य के आधार पर विनिमय कार्य को सम्पन्न करना आवर्तनशीलता की एक कड़ी है। आशा, विचार, इच्छाएँ निपुणता, कुशलता के रूप में कार्य करना सर्व विदित है। दूसरे विधि से आशा, विचार, इच्छा ही अनुभव मूलक विधि से जीवन ही निपुणता, कुशलता, पाण्डित्य का धारक वाहक हैं। यह सर्वविदित है। यह भी विदित है आशा, विचार, इच्छा के अनुसार ही मानव शरीर संचालन कर पाता है। ऐसी संचालन क्रियाकलाप में ही निश्चित विधि से निश्चित उत्पादन भी होना देखा जाता है। सामान्य आकाँक्षा एवं महत्वाकाँक्षा संबंधी वस्तुओं का उत्पादन कार्य में तत्पर व्यक्ति को देखने से यही दिखाई पड़ता है। जिस वस्तु का उत्पादन होना है उसका आकार, प्रकार उसके मानसिकता में होता ही है। फलस्वरूप उत्पादन कार्य सम्पन्न होता है। इस