सामान्य आकांक्षा | महत्वाकांक्षा | ||
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“वस्तु और कोष का अलग-अलग कोई स्थान नहीं होता।” क्योंकि अस्तित्व में वस्तु और उसका मूल्य अविभाज्य रूप में देखा जाता है। यही विधि/तथ्य सम्पूर्ण उत्पादित वस्तुओं में भी दिखाई पड़ता है। जैसे एक वाहन को छोटा या बड़ा सामने रखकर देखें इसका उपयोगिता मूल्य, सुन्दरता मूल्य और वह वाहन अलग-अलग हो सकता है? इस पर कितना भी सोचा जाए अंत में यह अविभाज्य है। यही मानव जाति से कहना बनता है।
“उत्पादित वस्तुओं में उपयोगिता मूल्य बना ही रहता है।” हर वस्तुओं का उपयोगिता मूल्य और कला मूल्य मानव के श्रम नियोजन का ही फलन है। मूल्यांकन श्रम का ही हो पाता है न कि प्रतीक वस्तुओं का। इस