तथ्य पर भी पहले विश्लेषण-निष्कर्ष प्रस्तुत किया जा चुका है। इसी विधि से मानव परंपरा में हर परिवार, हर स्तरीय परिवार स्वाभाविक रूप में समृद्धि, समाधान, अभय और सहअस्तित्व में ओत-प्रोत रहना अथवा यह सर्वसुलभ रहना ही परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था का एक अनिवार्यता है क्योंकि सर्वमानव का यही लक्ष्य है। ‘समृद्धि का आधार आवश्यकता से अधिक उत्पादित वस्तु, सदुपयोग और सुरक्षा के योगफल में होना देखा गया।’ इसका प्रमाण और उसकी निरंतरता अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था में गति का होना पाया जाता है। अतएव वस्तु और उसका मूल्य स्वाभाविक रूप में अविभाज्य बना रहता है। इसलिए विनिमय-कोष व्यवस्था सुन्दर, सुखद, समाधानपूर्ण मानव मार्ग है।

श्रम मूल्यांकन प्रणाली को पाने के लिए सहज ही हर स्तरीय समीति में अर्हताएँ और समाधानपूर्ण विधि अपनाना सहज है। क्योंकि जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान के योगफल में सर्वतोमुखी समाधान करतलगत रहता ही है। इसी क्षमता के उपयोगवश मूल्यांकन क्रियाकलाप सम्पन्न होता है। इसकी पुष्टि में पहले भी इंगित कराया जा चुका है हर व्यक्ति सत्य में अनुभूत होना चाहता ही है। सच्चाई को प्रमाणित करना चाहता ही है। यह सर्वसुलभ होना समीचीन है क्योंकि जीवन ज्ञान, सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान मानव सहज रूप में ही स्पष्ट हो पाता है और किसी अन्य प्रकृति के आधार पर इसका प्रमाण स्थापित नहीं हुआ है यथा जीवावस्था, प्राणावस्था और पदार्थावस्था सहज कृतियाँ हर मानव में, से, के लिए दृष्टव्य हैं। इन सबका यथास्थिति परिपूर्ण अध्ययन, इनका अंतर संबंध, इनकी अविभाज्यता क्रम में उपयोगिता-पूरकता, परस्पर पूरकता, उसका प्रयोजन रूपी सहअस्तित्व, दृष्टा, कर्ता, भोक्ता केवल मानव में ही मौलिक रूप में ज्ञान, विवेक व विज्ञान विद्यमान है। इसीलिए मानव सम्पूर्णता के साथ हो, सार्वभौम व्यवस्था को और प्रत्येक मानव अपने में व्यवस्था होने के स्वरूपों को स्पष्टतया अध्ययन करता है। इसी क्रम में आवर्तनशील अर्थव्यवस्था समग्र व्यवस्था का अंगभूत होना सहअस्तित्व सहज प्रणाली है।

मूल्यांकन संबंधी निश्चयन हर ग्राम से आरंभ होकर विश्व परिवार विनिमय कोष तक संबंध रहना आवश्यक है। शिक्षा पूर्वक हर व्यक्ति में निपुणता, कुशलता, पाण्डित्य सुलभ होता है। फलस्वरूप उत्पादन कार्य में दक्ष होना पाया जाता है। इसी आधार पर प्रत्येक व्यक्ति में स्वायत्तता पूर्ण लक्ष्य अध्ययन काल से ही समाहित रहता है। सम्पूर्ण उत्पादन की कोटि और स्वरूप स्पष्ट हो चुका है। समृद्धि का सर्वाधिक आपूर्ति आहार, आवास, अलंकार संबंधी वस्तुओं, उपकरणों और सामग्रियों सहित प्रत्येक ग्राम सीमा में जो कुछ भी प्राकृतिक ऐश्वर्य, जलवायु, वन, खनिज, नैसर्गिकता के रूप में रहते ही हैं। इन्हीं आधारों पर या इन्हीं के पृष्ठभूमि में मानव अपना श्रम नियोजन करने का कार्यक्रम बनाता है। हर परिवार अपने प्रतिष्ठा के अनुरूप आवश्यकताओं का निर्धारण करने में मानवीयता पूर्ण शिक्षा संस्कार के बाद ही समर्थ होना पाया

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