जाता है। ऐसे परिवार मानवों से सम्बद्ध परिवार अपने आवश्यकता की तादात, गुणवत्ता सहित आवश्यकताओं को अनुभव करेंगे और उत्पादन कार्य को अपनायेंगे। हर गाँव में साधारणतया कृषि, पशुपालन, ग्राम शिल्प, कुटीर उद्योग, हस्तकला, ग्रामोद्योगों को अपनाना सहज है। इसी आधार पर हर परिवार के लिए आवश्यकतानुरूप उत्पादन कार्य का अवसर समीचीन होना स्पष्ट है। इसी के साथ यह भी स्पष्ट है कि सम्पूर्ण आवश्यकताएँ शरीर पोषण, संरक्षण और समाज गति में ही उपयोगी, सदुपयोगी, प्रयोजनशील है। इसी स्पष्ट नजरिये से जीवन ज्ञान सम्पन्न हर मानव को आवश्यकताएँ सीमित दिखाई पड़ती हैं और आवश्यकता के अनुरूप उत्पादन श्रम शक्ति मूलत: जीवन शक्ति की ही अक्षय महिमा होने के आधार पर आवश्यकता से अधिक उत्पादन में विश्वास स्वाभाविक है। यह स्वायत्त मानव में अभिव्यक्त होने वाले आयामों में से उत्पादन कार्य भी एक आयाम है। इस विधि से आवश्यकताएँ सीमित संयत होना पाया जाता है। इसी सूत्र के आधार पर अपने उत्पादन कार्यों को विभिन्न वस्तुओं के रूप में परिणित करने में निष्ठान्वित होते हैं।
एक ग्राम में कम से कम 100 परिवार की परिकल्पना की जाती है। पाँचों आयाम संबंधी व्यवस्था सफल होने के लिए कम से कम 100 परिवार का होना एक आवश्यकता है। 100 परिवार के बीच सामान्य आकाँक्षा संबंधित सभी अथवा सर्वाधिक वस्तुएँ ग्राम में ही उत्पादित होना सहज है। उत्पादन कार्यों में परिवार मानव जब संलग्न होता है, उसे निरीक्षण परीक्षण करने पर पता लगता है कि प्रत्येक उत्पादन कार्य निपुणता, कुशलता, पांडित्य सम्पन्न मानसिकता, विचार, इच्छा, समय खण्ड, हस्तलाघव और निश्चत साधन के योगफल में होना पाया जाता है। जहाँ तक साधनों की गणना है यह परंपरा के रूप में पीढ़ी से पीढ़ी अधिक साधन सम्पन्न होने की व्यवस्था है। यहाँ यह भी ध्यान रखना आवश्यक है मानव, जलवायु, धरती, वन, खनिज जैसी नैसर्गिकता में और अनंत और व्यापक ब्रह्मांडीय किरणों के वातावरण में होता हुआ देखने का मिलता है। इसी के साथ साथ मानवकृत उप-वातावरण सहज ही गण्य होता है। अभी यहाँ मानवकृत वातावरण में परिवर्तन, परिवर्धन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। नैसर्गिकता पर किए जाने वाले हस्तक्षेपों, श्रम नियोजनों, प्रतिफलों, उसकी उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनशीलताओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यह मानवकृत वातावरण में से एक पक्ष है। इसी के साथ साथ मानवकृत वातावरणिक सूत्र जुड़ा ही रहता है। अन्य वातावरण का तात्पर्य नैसर्गिक और ब्रह्मांडीय वातावरण अविभाज्य वर्तमानित रहने से है। इस प्रकार समग्रता के साथ ही यह धरती, धरती की समग्रता के साथ ही मानव, मानव के समग्रता के साथ ही व्यवस्था और समाज परिकल्पना अध्ययन, योजना और क्रियान्वयन क्रम में मानवीयतापूर्ण मानव के वैभव की पहचान होती है। इसी विधि से मानव समाज और व्यवस्था का अविभाज्य स्वरूप को परिवार और परिवारमूलक व्यवस्था के रूप में देखा गया है। जो स्वयं स्वराज्य और धर्म