संबंध सूत्रों को मानव जागृति पूर्वक विकास संबंध, रचना संबंध, जीवन संबंध, जागृति संबंध के रूप में देखने को मिलता है। यह भी पहले स्पष्ट हो चुका है परमाणु में विकास का संबंध परमाणु अंशों के परस्परता में होना देखा गया है। क्योंकि हर परमाणु निश्चित परमाणु अंशों की संख्या के साथ ही अपने वैभव को व्यवस्था के अर्थ में स्थापित कर पाता है। इसी क्रम में गठनपूर्ण परमाणु (चैतन्य इकाई) जीवन पद में अपने को स्पष्ट करता है। विकास का चरमोत्कर्ष बिन्दु गठनपूर्णता ही है।
प्रत्येक परमाणु अपने भार बंधनवश अणुबंधनपूर्वक रचनाओं को प्रमाणित किया उसमें से एक रचना यह धरती है। इसी धरती में प्राणावस्था के वनस्पति संसार, जीवावस्था के जीव संसार, ज्ञानावस्था के मानव परंपरा का शरीर रचना और पदार्थावस्था में रासायनिक-भौतिक रचनाएं हमें दिखती हैं। रासायनिक-भौतिक रचना रूपी जीव शरीरों द्वारा वंशानुषंगीय विधि से व्यवस्था को जीवन ही प्रमाणित करता है और मानव संस्कारानुषंगीय (समझदारीपूर्ण) विधि से अपने व्यवस्था के रूप में प्रमाणित करने का प्रयास जारी है। इन्हीं प्रयास क्रम में मानव परिवार मूलक स्वराज्य विधि से व्यवस्था में भागीदार होने का स्वरूप स्पष्ट हो गया है। अतएव प्रत्येक रचना और प्रत्येक जीवन अपने में व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदार होने का तथ्य स्पष्ट होता है। यह सहअस्तित्व विधि से ही सार्थक होता हुआ प्रमाणित है। मानव भी सहअस्तित्व विधि से व्यवस्था एवं समग्र व्यवस्था में भागीदारी को प्रमाणित कर सकता है। मानव ही जीवन जागृति के प्रमाणों को दृष्टा, कर्ता, भोक्ता विधियों से प्रमाणित करता है।
उपयोगिता को हम पहले से ही स्पष्ट किए हैं। यह क्रम से न्याय, धर्म और सत्य प्रधानता सहज प्रकाशन है। इस के आधार पर परिवार मानव, व्यवस्था मानव और जागृतिपूर्ण मानव (प्रमाणिक मानव) के रूप में अपने को प्रमाणित करने की गति में तन, मन, धन का उपयोग, सदुपयोग और प्रयोजनशील होने का तथ्य अभिहित है। इस प्रकार आवर्तनशीलता का आधार और सूत्र व्यवस्था ही है और व्यवस्था सूत्र के क्रम में ही वस्तुओं का सदुपयोग होना सहज है।
सदुपयोगिता क्रम और विधि से ही सम्पूर्ण मानव में आवश्यकताएँ संयत होते हैं, समृद्ध होने की संभावना बढ़ती है। फलत: उत्पादन कार्य करने के साधनों की वृद्धि एवं समय घटने की संभावना भी जुड़ी रहती है। क्योंकि आवश्यकता से अधिक साधन (समान्याकाँक्षा, महत्वाकाँक्षा के) एक पीढ़ी दूसरे पीढ़ी के लिए अर्पित करता रहेगा। यह मानव सहज कीर्ति है। इसी क्रम में सदुपयोगिता विधि से साधन अधिक होने के आधार पर ही समृद्धि सर्वसुलभ होना सहज है। समृद्धि के आधार पर ही उत्पादन मात्रा नियंत्रित होना भी सहज है। गुणवत्ता की ओर मानव का स्वाभाविक रुप से ध्यान होना पाया जाता है। क्योंकि हर मानव समृद्धि कल्पना के साथ ही गुणवत्ता की ओर परिकल्पना तो कर रहा है। जबकि अभी परिवार मूलक