इस धरती में नैसर्गिकता के परिप्रेक्ष्य में इस धरती के साथ जुड़ी हुई अनंत ब्रह्मांडीय किरणों-विकिरणों का आदान-प्रदान रूपी अनुस्यूत वातावरणों के परिप्रेक्ष्य में सुखद सुन्दर ये धरा अपने में सजी धजी थी। इन तीनों परिप्रेक्ष्यों के साथ मानव अपने ही भ्रमवश व्यक्त किए गए भय, प्रलोभन के आधार पर ही जितने भी विसंगतियाँ निर्मित किया है। विसंगतियाँ सदा ही पीड़ा का कारण होता है। यह तथ्य सबके समझ में आ चुका है। अस्तु, इन तीनों परिप्रेक्ष्यों में संगीतीकरण विधि को पहचानने का अवसर अभी भी समीचीन है। इस सौभाग्यमयी अवसर को सार्थक बनाने का मार्ग, विधि, ज्ञान, दर्शन, विवेक, विज्ञान, तर्क, निर्णय यह सब समग्र व्यवस्था में भागीदारीपूर्वक समाधानित होने का, सूत्र का अध्ययन और स्वीकृतियाँ अर्थात् संस्कार मानव के लिए समीचीन हो गया है। इसे जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान के रूप में पहचाना गया है।

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