प्रमाणों के आधार पर जीव चेतनावश सर्वाधिक मानव संख्या पशु मानव-राक्षस मानव के कोटि में गण्य होते ही रहे। पशु मानव के साथ राक्षस मानव शोषण क्रियाओं को विविध आयामों में जारी रखा। वस्तु व्यापार, युद्ध व्यापार, धर्म व्यापार, ज्ञान व्यापार इन्हीं के अंगभूत सभी व्यापार शाखाएं भ्रमित मानव को स्वीकृति के लिए विवश करते ही रहे स्वयम् भ्रमित रहना स्वीकार नहीं हो पाया। मानव तो अब बरबादी को आबादी की दुहाई देते हुए अपने ढंग से पतली गली बना लिया, साथ-साथ धरती का शक्ल बदल गई। विकृत स्वरूप की ओर ढल चुकी। इसके आधार पर मानव को पुनर्विचार करने की आवश्यकता भी समीचीन रही ही। अतएव स्थिरता-निश्चयता के आधार पर ही अस्तित्व सहज सहअस्तित्व में ही प्रत्येक एक का वैभव व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी का अध्ययन सूत्र मानव कुल में प्रकाशित होना एक आवश्कता रही क्योंकि मानव कुल स्व नियंत्रित दूसरी भाषा से स्व-स्वीकृति पूर्वक व्यवस्था में होना अथवा भ्रमित होना देखा गया है। स्वीकृत होने का क्रम सच्चाई की ओर अपेक्षा के रूप में बना ही रहता है। क्योंकि हर भ्रमित व्यक्ति भी सच्चाई की दुहाई देता ही है। इसी आधार पर सच्चाई सार्वभौम कसौटियों के साथ स्वीकृत होने की सम्भावना समीचीन है ही।
सार्वभौमता की कसौटी अपने आप में व्यवस्था और समग्र में व्यवस्था में भागीदारी है क्योंकि मानवेत्तर प्रकृति में व्यवस्था स्पष्ट है और मानव में भी व्यवस्था की आवश्यकता है। व्यवस्था में जीने का प्रमाण वर्तमान में विश्वास ही है। वर्तमान में विश्वास का वैभव स्वयं में समाधान, परिवार में समृद्धि, अखण्ड समाज में अभय, सार्वभौम व्यवस्था में सहअस्तित्व, नित्य प्रमाण है। यही वर्तमान में विश्वास का स्वरूप है, कार्यरूप है, गतिरूप है।
सार्वभौम व्यवस्था में, अखण्ड समाज में, मानवीयतापूर्ण परिवार में स्वयं स्वायत्तता के रूप में, अनुभव बल, विचार शैली, जीने की कला ही स्वयं पुन: अनुभव बल के रूप में प्रयोजित होना अर्थात् सुख, शांति, संतोष, आनंद का स्रोत होना पाया जाता है। प्रत्येक स्वायत्त व्यक्ति में अनुभव और उसकी निरंतरता नित्य रस है। इस का तात्पर्य आनन्द रस ही है। अनुभव बल का धारक वाहकता प्रत्येक मानव में आवश्यकता ही है। इसके आपूर्ति-संपूर्ति जीवन ज्ञान, सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान विधि से समीचीन है। सम्पूर्ति का तात्पर्य क्रियापूर्णता, आचरणपूर्णता के अर्थ में प्रमाणित होने के रूप में है। प्रमाणित होने का स्वरूप अनुभव बल, विचार शैली, जीने की कला का अविभाज्यता है। आपूर्ति का तात्पर्य आवश्यकता के अनुसार समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व का प्रमाण हर मानव के लिए सहज, सुलभ रहने से है। यह परंपरा में भागीदारी के अर्थ में सार्थक बनाता है। परंपरा कम से कम परिवार से है। स्वायत्त मानव ही परिवार मानव होना पहले से स्पष्ट है। प्रत्येक स्वायत्त मानव में स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान,