व्यवसाय में स्वावलंबन, व्यवहार में सामाजिक अर्थात् अखण्ड समाज में भागीदारी सहज ज्ञान, दर्शन, आचरण, विवेक और विज्ञान सम्पन्नता से है। ज्ञान, दर्शन, जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन के रूप में स्पष्ट हो चुका है। विवेक का तात्पर्य जीवन का अमरत्व, शरीर का नश्वरत्व और व्यवहार के नियमों के प्रति पूर्ण जागृति फलत: स्वीकृति और संकल्प, दृढ़ता उसकी निरंतरता का स्वरूप है। व्यवहार के नियम, मानवीयतापूर्ण आचरण के रूप में स्पष्ट हो चुका है जो मूल्य, चरित्र, नैतिकता का अविभाज्य कार्यकलाप है। यह भी आवर्तनशीलता का ही स्वरूप है। चरित्र का पोषण मूल्य, मूल्य का पोषण नैतिकता, और नैतिकता का पोषण चरित्र किया जाना हर जागृत मानव में आंकलित होती है। जागृत मानव परंपरा में मानव का जागृत होना सहज है। हर व्यक्ति जागृत होना चाहता ही है, वरता भी है; परंपरा जागृत न होने का फल ही है भ्रमित रहना। भ्रमित परंपरा में अर्पित हर मानव संतान भ्रमित होने के लिए बाध्य हो जाता है। परंपरा का कायाकल्प अर्थात् परिवर्तन और सर्वतोमुखी परिवर्तन एक अनिवार्यता है ही। इसकी सफलता जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान पर आधारित है जो अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन है जिसके आधार पर ही मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद) स्पष्ट रूप में अध्ययनगम्य है।

मध्यस्थ दर्शन मूलत: मध्यस्थ सत्ता, मध्यस्थ क्रिया, मध्यस्थ गति और मध्यस्थ जीवन का प्रतिपादन है जो वांङ्गमय के रूप में स्पष्ट हो चुका है जिसके अध्ययन से मानवीयतापूर्ण आचरण स्वयं स्फूर्त रूप में प्रमाणित होता है।

जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान ही अनुभव बल का स्वरूप और स्रोत है। यही अनुभव बल, विचार शैली के रूप में संप्रेषित होते हुए देखा जाता है। ऐसे स्थिति में विज्ञान सम्मत विवेक, विवेक सम्मत विज्ञान विधि से विचार शैली का स्वरूप होना पाया गया। ऐसी विचार शैली स्वयं में मध्यस्थ दर्शन सूत्रों से एवम् सहअस्तित्ववादी सूत्रों से सूत्रित होना स्वाभाविक रहा। यही सहअस्तित्ववाद, समाधानात्मक भौतिकवाद, व्यवहारात्मक जनवाद और अनुभवात्मक अध्यात्मवाद के रूप में प्रस्तुत है। यही विचार शैली पुन: शास्त्रों के रूप में संप्रेषित हुई है। इसमें से आवर्तनशील अर्थचिंतन शास्त्र और व्यवस्था का मूल स्वरूप इस प्रबंध के द्वारा मानव कुल के लिए अर्पित है। इसी के साथ-साथ व्यवहारवादी समाजशास्त्र जो स्वयं में मानवीयतापूर्ण आचार संहिता रूपी संविधान सूत्र और व्याख्या है तथा मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान मानव कुल के विचारार्थ प्रस्तुत है। भ्रमित मानव भी शुभ चाहता है। शुभ का स्वरूप समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व है। यह सर्वमानव स्वीकृत है। इनके सार्वभौमता को अध्ययन विधि से सुस्पष्ट करना ही मध्यस्थ दर्शन (अनुभव बल), विचारशैली और शास्त्र (जीने की कला) का उद्देश्य है। अतएव आवर्तनशील अर्थचिंतन का आधार सहअस्तित्व तथा सहअस्तित्व में मानव में अनुभव सहज जीना ही है। अस्तित्व ही

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