हर परिवार मानव में जागृति का प्रभाव, जागृति का वैभव मुखरित रहता ही है। इसी आधार पर हर अभिभावक शिशुकाल से ही जागृतिकारी संस्कारों को स्थापित करने में सफल होते ही हैं। यह हर जागृत नर-नारी का कर्तव्य भी है, दायित्व भी है। इससे यह स्पष्ट है हर मानव अभिभावक पद को पाने से पहले स्वायत्तपूर्ण रहना एक आवश्यकता है और परिवार मानव के रूप में प्रमाणित रहना सर्वोपरि अनिवार्यता है ही।
मौलिक अधिकार का प्रयोग जागृत और जागृतिपूर्ण मानव ही सम्पन्न करता है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि मानव संतान जागृति क्रम में होना और हर अभिभावक जागृत परंपरा में भागीदारी का निर्वाह करना एक नैसर्गिक उत्सव है। इसी के साथ यह भी स्पष्ट हो गया अस्तित्व में मानव ही जागृति और जागृतिपूर्ण परंपरा पूर्वक ही मौलिक अधिकार सम्पन्न वैभव को प्रमाणित करता है। ऐसा जागृत अभिभावक ही अपने संतानों को मानवीयतापूर्ण संस्कार का प्रेरक, दिशादर्शक, सर्वतोमुखी समाधान प्रदायक हो पाते हैं। ऐसे अभिभावक पद और संतान पद उत्सव सहज होना पाया जाता है।
जागृत परंपरा में ही जनसंख्या नियंत्रण स्वाभाविक रूप में होता है अर्थात् जागृत मानव स्वयं स्फूर्त विधि से नियंत्रित होता है। समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व सहज प्रमाण परंपरा रूपी मानवीयतापूर्ण परिवार प्रयोजन और आवश्यकता का संतुलन बनाए रखने में सक्षम होता है। जनसंख्या, उसके लिये मानसिकता, आवश्यकता और प्रयोजन के साथ ही संतुलित होना संभव है। जागृति का यही देन है। सम्पूर्ण आवश्यकताएँ प्रयोजनों की कसौटी में परीक्षित प्रमाणित होना ही जागृति का साक्ष्य है। जीवन सहज रूप में जागृति नित्य वर है। वर का तात्पर्य जिसके बिना सुखी होने का कोई और विकल्प ही नहीं है। इसी क्रम में जीवन जागृतिपूर्ण विधि से ही सुख और उसका निरंतरता उत्सव से उत्सवित रहता है। इसके साक्ष्य में यह भी प्रतिपादित हो चुका है कि समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व हर परिवार मानव में प्रमाणित रहता ही है। क्योंकि हर परिवार मानव स्वायत्त और जागृत रहना, जागृति परंपरा सहज वैभव और उपलब्धि है। यही नित्य उत्सव का भी आधार है।
सभी प्रकारों के उत्सवों में मानव का प्रयोजन और उसकी सर्वसुलभता, उसकी विधि प्रक्रिया उसमें प्रमाणिक होने का प्रमाण और उसमें ओतप्रोत परिस्थिति का अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन, संवाद, प्रतिपादन, व्याख्या, सूत्र, ऐसे सम्पदा का स्वत्व, स्वतंत्रता, अधिकारों का सत्यापन; यही मुख्यतः उत्सव का अंग-अवयव है। यही मानव परंपरा में पावन मानसिक