सप्त धातुओं से रचित रचनाओं में समृद्ध मेधस और समृद्धिपूर्ण मेधस पर्यन्त रचना संबंध शरीर जो कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय उसके लिए आवश्यकीय अंग अवयव, आशय रसादितंत्र विधि सम्पन्न रचनाएँ गर्भाशय में सम्पन्न होता है। ये सर्वविदित तथ्य है। शुक्र सूत्र पुरूष शरीर में, डिम्बसूत्र स्त्री शरीर में रचित होता है। इन दोनों का मूल तत्व पुष्टि तत्व रचना तत्व है। पुष्टि तत्व मूलतः रासायनिक द्रव्य ही है। इस विधि से मानव शरीर भी रचित होता है।
जीव शरीरों को जीवन, शरीरों के वंशानुगत विधि स्वीकार सहित संचालित करता है। जीव शरीरों को संचालित करता हुआ जीवन का लक्ष्य इन्द्रिय सन्निकर्ष ही है। जबकि मानव का लक्ष्य समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व है। यही व्यवस्था सूत्र और समाज सूत्र का उद्गमता धारक-वाहक होने का प्रमाण है। इसकी समीचीनता सर्वमानव के लिये समान रूप में वर्तमान है। इस लक्ष्य की ओर प्रवेश विधि कल्पनाशीलता, कर्मस्वतंत्रता के रूप में प्रत्येक मानव संतान में होना पाया जाता है। इसी मौलिक प्रकाशन के आधार पर मानव चिंतनपूर्वक (न्याय, समाधान, प्रामाणिकता पूर्वक) प्रमाणित होने का क्रम है।
कल्पनाशीलता कर्मस्वतंत्रता का प्रयोग हर मानव संतान जन्म समय से ही करता है। मौलिक अधिकार सम्पन्न जागृत मानव परंपरा में अर्पित होता है। इसका साक्ष्य जन्म से ही हर मानव संतान में न्याय की अपेक्षा, सही कार्य-व्यवहार करने की इच्छा और सत्यवक्ता होना। कम से कम तीन वर्ष के शिशुओं के अध्ययन से एवं अधिक से अधिक पाँच वर्ष के शिशुओं के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है। इसे हर मानव निरीक्षण, परीक्षण पूर्वक अध्ययन कर सकता है। यही मुख्य बिन्दु है। इस आशयों को अर्थात् शिशुकाल में से मुखरित इन आशयों का आपूर्तिकरण ही जागृत मानव परंपरा का वैभव है।
जीवन ज्ञान, सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान केन्द्रित मानवीयतापूर्ण शिक्षा प्रणाली, पद्धति, नीतिपूर्वक किये गये अध्ययन-अध्यापन कार्य विधि से शिशुकालीन तीनों अपेक्षाओं का भरपाई होता है। जीवन ज्ञान सम्पन्नता से हर मानव में दृष्टा पद प्रतिष्ठा में, से, के लिये वर्तमान में विश्वास होता है। फलतः न्यायप्रदायी क्षमता प्रमाणित हो जाती है। अस्तित्व दर्शन की महिमावश सहअस्तित्व, सहअस्तित्व में व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी उसकी आवश्यकता और प्रयोजन बोध होता है जिससे सही कार्य-व्यवहार करने का अर्हता स्थापित होता है।