का मूल्यांकन उभय पक्ष करता है। शैशवकालीन स्थितियों के अलावा अन्य सभी स्थितियों में परस्पर मूल्यांकन सम्पन्न होना सहज है। जैसे प्राकृतिक प्रकोप के लिये अर्पण-समर्पण, किया गया पूरकता कार्य विधि का मूल्यांकन उभय पक्ष करना स्वाभाविक है और इसमें उभय तृप्ति का होना भी स्वाभाविक है। इसी प्रकार रोगी और संतानों के साथ किया गया अर्पण-समर्पण से उन-उन का सुरक्षा स्वाभाविक रूप से सम्पन्न हो पाता है। जिससे उभयतृप्ति होना देखा गया है। यही न्याय है। संतान जब कौमार्य और युवावस्था में होते हैं अभिभावकों से निर्वहन किया गया क्रियाकलाप अर्पण-समर्पण का मूल्यांकन स्वाभाविक रूप में जीवन जागृतिपूर्वक होता ही है। मानवीय शिक्षा पूर्वक जीवन जागृति समीचीन रहता ही है। इसी प्रकार सभी संबंधों में किया गया पहचान मूल्यों का निर्वहन और उभयतृप्ति जागृत परंपरा में एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में उभयतृप्ति नित्यभावी रहता ही है। जागृत परंपरा में केवल किशोरावस्था तक मानव संतान जागृतिशील रहना देखा गया है। युवा और प्रौढ़ अवस्था में हर मानव, परिवार मानव के रूप में वैभवित रहता ही है। परिवार मानव का स्वरूप, कार्य और परिभाषा सदा-सदा ही न्याय और नियम संबंध विधि से ही सम्पन्न हुआ करता है। इसी के प्रमाण में हर परिवार मानव समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व का धारक-वाहक होना जागृति सहज तथ्य है। जागृति मानव का वर होने के कारण जागृतिपूर्वक ही हर मानव मानवत्व सहित व्यवस्था के रूप में प्रमाणित होना समग्र व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करता हुआ देखने को मिलता है। यही न्याय का आद्यान्त स्वरूप है। शिशुकाल में केवल मूल्यांकन व्यक्त नहीं हो पाता है, तृप्ति अपने आप प्रमाणित होती है। यह पोषण-संरक्षण का फलन होना पाया जाता है। मूल्यांकन पूर्वक तृप्त रहने के लिये उभय जागृत रहना आवश्यक रहता ही है। जागृत परंपरा में हर संतान जागृतशील होता ही है। जागृति के अनन्तर मूल्यांकन भावी हो जाता है। मूल्यांकन में उभयतृप्ति ही संतुलन बिन्दु है। यही न्याय का प्रकाशन है। ऐसा मूल्यांकन हर न्याय-सुरक्षा समिति में सम्पन्न होना स्वाभाविक है।

न्याय-सुरक्षा समिति किसी भी स्थिति में मूल्यांकन करने में समर्थ रहता है। हर स्थितियों में संबंध, मूल्य, मूल्यांकन ही प्रमुख बिन्दु बना रहता है। जागृत मानव; संबंधों की अवधारणा से परिपूर्ण रहता ही है। मूल्यों का अनुभव हर जागृत मानव में वर्तमान रहता ही है। इसी आधार पर मूल्यांकन सुलभ हो जाता है। फलस्वरूप समीचीन उभय पक्ष में तृप्ति का होना देखा जाता है।

न्याय-सुरक्षा का स्वरूप, कार्य और फलन परस्पर तृप्ति ही है। यह तृप्ति परस्परता में विश्वास के रूप में ही पहचाना जाता है। विश्वास अपने में जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करने के रूप

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