सार्थक, आवश्यक, अतिवांछनीय जैसा विचार स्वीकृति और आशा के रूप में भी स्वीकृतियाँ मनुष्य में रहता ही है। ऐसा संबंध और संबंधों का प्रयोजन निम्न प्रकार से पहचाना जाता है।
प्राकृतिक संबंधों का प्रयोजन
धरती का संतुलन, जल का संतुलन, वायु का संतुलन, वन-खनिज का संतुलन, इनके संतुलन के फलस्वरूप ऋतु संतुलित रहना पाया जाता है। धरती के संतुलित होने के उपरान्त ही अन्य सभी संतुलन साकार होना स्वाभाविक रहा है। उसके उपरान्त मानव प्रकृति का धरती पर अवतरित होना स्वाभाविक रहा है। मानव ने अभी तक इन चारों विधाओं में असंतुलन न्यूनातिरेक रूप में पैदा कर चुका है। इसका मूल कारण अनानुपाती वन खनिज का शोषण। जलवायु का प्रदूषण, धरती में ताप व प्रदूषण प्रधान रहा है। यह सर्वविदित हो चुकी है ऐसे प्रदूषणों के आधार पर मानव का इस धरती पर जीना दूभर होता जा रहा है। इससे छूटना अति आवश्यक मुद्दा है। इसीलिये कि धरती ही असंतुलित होने के उपरान्त मानव का इस धरती पर रहने का प्रश्न ही नहीं रहता। इसी कारणवश सर्वमानव को अपेक्षा सहज जागृति सम्पन्न होना आवश्यक है। ऐसी जागृति के लिए तीन महत्वपूर्ण अध्ययन कार्य सम्मुख है। 1. जीवन ज्ञान, 2. सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान, 3. इन दोनों मुद्दे में पारंगत होने का फल-परिणाम मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान देखा गया है। तीनों मुद्दे पर पारंगत होने के लिये सर्वमानव में जीवन सहज रूप में अर्हता है ही। अस्तु सर्वमानव जीवन ज्ञान रूपी परमज्ञान, सहअस्तित्व दर्शन रूपी परम दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण रूपी परम आचरण ज्ञान में सहज पारंगत हो सकता है। इसके मूल में अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन ही प्रधान वस्तु है। अस्तित्व में दृष्टा केवल मानव होने के कारण ही बहुमुखी बहुआयामी प्रतिभा व्यक्तित्व, व्यवहार और व्यवसाय (उत्पादन) सम्पन्न होने का आधार सर्वमानव में प्रकारान्तर से रहता ही है। इन्हीं प्रवृत्तियों प्रमाणों के आधार पर मानव संतुलन और प्राकृतिक संतुलन को हर व्यक्ति के ध्यान में लाना, आवश्यकता के रूप में स्वीकारना, अनिवार्यता के रूप में मूल्यांकित करना फलस्वरूप कार्य-व्यवहार में प्रमाणित करना सहज है।
ऊपर कई निश्चयों के समर्थनों में अथवा विकल्पात्मक प्रस्ताव के समर्थन में सर्वमानव में वांछित सर्वशुभ का स्वरूप भी हमें समझ में आता है इससे समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व सर्वसुलभ होने की अपेक्षा भी धरती और मानव संतुलन के साथ-साथ निहित है।