है। अस्तित्व में जीवन भी अविभाज्य है। अस्तित्व में ही रासायनिक, भौतिक रचना-विरचना परिणामों के रूप में दृष्टव्य है। ऐसे भौतिक-रासायनिक रचनाओं में से एक रचना मानव शरीर भी है। मानव शरीर रचना विधि मानव परंपरा में सर्वविदित है। इसीलिये जीवन ज्ञान की आवश्यकता अति अनिवार्य है।

जीवन ही जीवन को, जीवन से जानने-मानने की व्यवस्था बनी हुई है। प्रत्येक मानव स्वयं का अध्ययन कर सकता है। क्योंकि प्रत्येक मानव में चयन-आस्वादन, विश्लेषण-तुलन, चित्रण-चिंतन, संकल्प-बोध, प्रामाणिकता और अनुभव, सम्पन्न होता हुआ देखा जा सकता है। प्रत्येक मानव में यह सभी क्रियायें पूर्णतया क्रियाशील होना, इसके दृष्टापद में होना, यह सब सत्यापित प्रमाणित होना ही मानव में जागृत परंपरा का स्वरूप है। उल्लेखनीय तथ्य यही है कि प्रत्येक मानव जागृत होना चाहता है। जागृति और अजागृति के बीच कौन सी ऐसी वस्तु है, कारण है, इसे परिष्कृत रूप में समझना ही एक मात्र उपाय है। हम इसे स्पष्टतया देखे हैं और सभी देख सकते हैं कि शरीर को जीवन समझना ही मूल मुद्दा है भ्रम का। इसके साथ जुड़ा हुआ दूसरा मुद्दा शरीर के बिना मानव परंपरा नहीं है। इन्हीं के अनुपम संयोग से ही अनेक समस्या और समाधानकारी गति और प्रवाह है। प्रत्येक मानव किसी न किसी अंश में आशा, विचार, इच्छा के रूप में प्रभाव है क्योंकि यह दूर-दूर तक प्रभावित करते आया। इसीलिये इसे प्रवाह के रूप में देखना सबके लिये सुलभ है। मानव में व्यक्त होने वाली संपूर्ण गतियाँ, प्रवाहित होने वाले आशा, विचार, इच्छा, सहित किये जाने वाले कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित क्रियाकलाप ही हैं। क्योंकि गति और प्रवाह अलग-अलग होते नहीं। इसे दूसरे विधि से प्रवाह और दबाव कहा जा सकता है। तीसरे विधि से प्रवाह और प्रभाव क्षेत्र कहा जा सकता है।

यह सर्वविदित है कि प्रत्येक एक अपने वातावरण सहित सम्पूर्णता सहज वैभव है। ऐसी सम्पूर्णता में गति, स्थिति निहित रहती ही है। प्रभाव क्षेत्र ही प्रत्येक एक का अपने सीमा से अधिक वैभव का प्रमाण है। इसी क्रम में एक परमाणु अपने लंबाई, चौड़ाई, ऊँचाई से अधिक क्षेत्र में अपने प्रभाव को बनाए रखता है। इसका प्रमाण एक परमाणु, दूसरे परमाणु के बीच में शून्य स्थली दिखाई पड़ती है। इसी प्रकार परमाणु में निहित प्रत्येक अंश के परस्परता में भी शून्य स्थली रहता ही है। यह साम्य ऊर्जा सहज वैभव है। ऐसे ऊर्जा में निहित प्रत्येक परमाणु अपने त्व सहित पहचान और महिमा को स्थापित किया रहता है। यही प्रभाव क्षेत्र का तात्पर्य है। इसको और भी समझने जाएँ तो हर एक, एक-दूसरे के साथ व्यवस्था सहज वैभव में भागीदारी रूप में ही होते हैं। इससे

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