मूल्यांकन करें। सर्वशुभ रूपी कार्यक्रमों, विचारों, प्रवृत्तियों, निष्कर्षों को मानव के सम्मुख प्रस्तुत करना “व्यवहारवादी समाजशास्त्र” का प्रधान उद्देश्य है।
उपभोक्तावादी संस्कृति सदा-सदा के लिये सामाजिक होना संभव नहीं है। उपायों से भोग विधियों को पहचान लेना ही उपभोक्तावाद है। उपभोक्तावादी विचार स्वयं संग्रह की ओर है और सुविधा उसका लक्ष्य बना रहता है। सम्पूर्ण सुविधाएँ इन्द्रिय सन्निकर्ष में व्याख्यायित है। इसे भोगवाद के लिये आधार रूप में पहचानने सर्वोपरि उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया। कर ही रहे हैं। ऐसे उपभोक्ता संस्कृति में अच्छे से अच्छे मकान, अच्छे से अच्छे गाड़ी, अच्छे से अच्छे वस्तु, आभूषण अथवा प्रसाधन और अलंकार विधियाँ गण्य है। उन्मुक्त विचारों और प्रवृत्तियों के लिये अनुकूल स्थलियों का भी परिकल्पनाएँ है। यही एक परिवार की सीमा में शयनागार, प्रसाधनागार और आहार स्थली (भोजनागार) के रूप में पहचाना गया है। इसकी साज सजावट रचना उपयोग भंगिमाओं पर चर्चायें उन्नतशील विधि से होती ही रहती है। ऐसे प्रवृत्तियों में पले हुए व्यक्तियों को देखने पर सर्वेक्षण करने पर यही दिखाई पड़ता है। इनमें से सर्वाधिक लोग उत्पादन से जुड़े हुए नहीं है। सम्पूर्ण वैज्ञानिक आवाजों का बुलंद होने के क्रम में प्रौद्योगिकियों की स्थापना और उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन जोर शोर विधि से देखने को, सुनने को मिलती ही रहती हैं। इन आवाजों में जोर शोर से यही कहा जाता है हर वस्तु आप जो चाहेंगे वह सब डब्बा में बंद होकर आपके घर पहुँचेंगे। उसके भरपायी में हर उपभोक्ता को मुद्रा भर देना है आपको कुछ करना नहीं है। उपभोक्ताओं को उत्पादन की ओर सोचना ही नहीं है। सभी उत्पादन उपभोक्ताओं के उपहार के रूप में ही प्रस्तुत होने का घोषणा करते हैं। यह विशेषकर आहार वस्तुएँ, अलंकार वस्तुएँ और आवास वस्तुओं में से ईंटा, पत्थर, रेत और लोहा को छोड़कर बाकी सब बंद पैक में ही आती है। सभी बंद पैक, उत्तम पैक, आकर्षक पैक में सुरक्षित होकर उपभोक्ता के पास पहुँचता है। इसमें उपभोक्ता भी बहुत बाग-बाग होते हैं। इसमें बाग-बाग होने के तर्क में से एक डब्बे के खाने से घर काला नहीं होता है। भले ही सम्पूर्ण शहर प्रदूषण से भरा हो। यथा कहीं भी शुद्ध हवा नहीं मिलता हो घर के अन्दर धुँआ का दाग न होने पर बाग-बाग होता हुआ, गदगद होता हुआ उपभोक्ताओं को देखा जा सकता है। स्वच्छ-सुंदर डब्बे के अंदर आहार औषधि वस्तुएँ बंद होने के उपरान्त उसे पावन वस्तु मानी ही जाती है। भले ही उसके अन्दर कुछ भी रहता हो। इस विधि से पैक और नामों पर विश्वास दिलाना ही सम्पूर्ण उपभोक्ता संसार में प्रचार वह भी आकर्षक प्रचार को अपनाया जाना देखा गया है। आकर्षक प्रचार के तात्पर्य में सर्वाधिक भाग किसी लड़का-लड़की का स्वीकृतियाँ, मुद्राएँ, भंगिमाएँ अंगहार सब सविपरीत यौन उन्माद के लिए