सब अर्थात् मानव संबंध, नैसर्गिक संबंध, ब्रह्माण्डीय संबंध निरन्तर वर्तमान है ही। इनके प्रति जागृत होना ही संबंधों को पहचानना - मूल्यों को निर्वाह करने का तात्पर्य है। मूल्यांकन विधि से उभयतृप्ति का प्रमाण होता है। जैसे - स्वयं पर विश्वास सम्पन्न हर मानव के परस्परता में होने वाली पोषण और पोषित होने की क्रिया; संरक्षित होने, संरक्षित करने की क्रिया; शिक्षित होने और शिक्षा प्रदान करने की क्रिया; समाधानपूर्ण कार्य करने, कराने और करने के लिये मत देने की क्रिया; न्याय प्रदान करने और न्याय पाने की क्रिया; संस्कार ग्रहण करने-कराने की क्रिया; सहअस्तित्व सहज सम्पूर्णता को निर्देशित करने, निर्देशित होने की क्रिया; अस्तित्व सहज सहअस्तित्व को स्वीकार करने योग्य संस्कारों को स्थापित करने और स्वीकारने की क्रिया; अस्तित्व में विकास और जागृति को बोध कराने एवं बोध सम्पन्न होने की क्रिया। इसी प्रकार जीवन और जागृति को बोध कराने, बोध होने की क्रिया; व्यवस्था में जीने की स्वीकृति रूपी संस्कार प्रदान और स्वीकार क्रिया; अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी की आवश्यकता को बोध कराने एवम् बोध होने की क्रिया। समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्वपूर्ण जीने की कला में दृढ़ता को स्थापित करने और दृढ़ता से सम्पन्न होने की क्रियाकलापों में मूल्यांकन सहज तृप्ति को पाया जाता है। यही कोण, आयाम, परिप्रेक्ष्यों में विधिवत् तृप्ति पाने का स्रोत है। यह समीचीन है। यह एक आवश्यकता भी है। इन्हीं तृप्तियों को पाने के क्रम में मूल्यों का निर्वाह करना सहज है। इस प्रकार व्यवहार में सामाजिक होने का सम्पूर्ण अर्हता स्वायत्त मानव में शिक्षा-संस्कारपूर्वक समाहित होता है और प्रमाणित होता है।
व्यवसाय में स्वावलंबन एक आवश्यकीय प्रक्रिया है। मानव में, से, के लिये आवश्यकताएँ दो रूप में पाया जाता है - 1. सामान्य आकांक्षा, 2. महत्वाकांक्षा से संबंधित वस्तु और उपकरण। सामान्याकांक्षा में वांछित वस्तुएँ आहार, आवास, अलंकार कार्यों में उपयोगी होना पाया जाता है। शरीर पुष्टि और संरक्षण के रूप में आहार को, संरक्षण के अर्थ में आवास और अलंकार को उपयोगी होना पाया जाता है। महत्वाकांक्षा संबंधी वस्तुएँ ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के गति सीमा से अधिक गति के लिये दूरश्रवण, दूरदर्शन, दूरगमन का प्रयोजन देखने को मिलता है। इसे पहले भी स्पष्ट किया जा चुका है। उल्लेखनीय तथ्य यही है कि सामान्य आकांक्षा संबंधी वस्तुओं से ही समृद्धि का प्रकाशन हो पाता है। महत्वाकांक्षा संबंधी वस्तुएँ समय-समय पर दूरसंचार समाज गति में पूरक रूप में उपयोगी होते हुए समृद्धि का आधार नहीं बन पाता है। गति और शीघ्रता के आधार पर इसका मूल्यांकन हो पाता है। अतएव इन यंत्रों के न्यूनतम उपयोग से ही अथवा आवश्यकता विधि से इसका उपयोग करना ही इसके वैभव का प्रमाण है। इन वस्तुओं का राक्षसी,