पाशवीय विधि से कितना भी उपयोग करे वह एक व्यसन के रूप में दिखाई पड़ेगा न कि समृद्धि के रूप में। इसको इस धरती के सम्पूर्ण मानव देख चुके हैं कोई बचा होगा वह देख भी सकता है। इससे यह स्पष्ट हो गया कि सामान्य आकांक्षा संबंधी वस्तु-उपकरण समृद्धि का द्योतक है और इसकी सम्भावना भी समीचीन है।

महत्वाकांक्षा संबंधी वस्तुओं का अधिकता होने के उपरान्त भी समृद्धि का अर्थ पूरा नहीं होता है। इनका अम्बार लगाने के क्रम में ही धरती का पेट फाड़ने की गति त्वरित हुई है।

सामान्य आकांक्षा संबंधी वस्तुओं को पाने के लिये धरती को तंग करने की आवश्यकता उत्पन्न ही नहीं होता क्योंकि धरती के पेट में आहार, आवास, अलंकार संबंधी वस्तुएँ न्यूनतम है और ये वस्तुएँ धरती के ऊपरी सतह से ही प्राप्त हो जाती है। आहार के लिये कृषि, अलंकार के लिये भी कृषि और वन्य उपज पर्याप्त होता है। आवास के लिये भी धरती की ऊपरी सतह में मिलने वाले द्रव्यों से सुखद आवास स्थली को पाया जा सकता है। मानसिकता जागृत और भ्रमित का द्योतक है। मानव ही जागृत अथवा भ्रमित मानसिकता के आधार पर ही कार्य-व्यवहारों को निश्चय करता है। भ्रमित मानसिकता विधि से ही भय, प्रलोभन, स्वर्गाकांक्षा और उपभोक्ता विधि ही मानव के पल्ले पड़ता है और पड़ा ही है। जागृति सहज विधि से आवश्यकताएँ समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्वपूर्ण विधि से जीने की कला है। ये कितना आवश्यक है अब हर मानव समझ सकता है। अतएव सामान्याकांक्षा संबंधी वस्तुओं के विपुलीकरण के आधार पर हर परिवार समृद्ध होने, अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था क्रम में सर्वतोमुखी समाधान सम्पन्न होने, वर्तमान में विश्वास पूर्वक किये जाने वाली सम्पूर्ण कार्य व्यवहार से मानव अभयशील और पूर्ण होने तथा परम जागृति पूर्णता और उसकी निरन्तरता पूर्वक सहअस्तित्व में समाज गति के साथ नित्य तृप्त होने का कार्यक्रम ही मानवीयतापूर्ण कार्यक्रम है। अतएव मानवीयतापूर्ण शिक्षा कार्यक्रम, मानवीय संस्कार समुच्चय कार्यक्रम, मानवीयतापूर्ण आचरण रूपी संविधान कार्यक्रम, मानवीयता सहज स्वास्थ्य-संयम कार्यक्रम, परिवार मूलक स्वराज्य कार्यक्रम का अध्ययन, अवधारणा और आचरण, व्यवहार ही मानवीयतापूर्ण मानव परंपरा का कार्य है।

मानव परिवार और कार्य

स्वायत्त मानव ही अर्थात् स्वायत्त नर-नारी ही परिवार मानव के रूप में प्रमाणित होते हैं। परिवार का परिभाषा में वर्तमान होना ही स्वायत्त मानव का प्रमाण है। मानवीय शिक्षा-संस्कारपूर्वक ही

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