अधिकार :- मानवीयतापूर्ण आचरण करना, कराना एवं करने के लिये मत देना प्रत्येक मानव का मौलिक अधिकार है। मानवीयतापूर्ण आचरण मूल्य, चरित्र और नैतिकता का अविभाज्य स्वरूप है। ‘मानव’ शब्द से प्रत्येक/सम्पूर्ण नर-नारी सम्बोधित हैं।
मानव में समानता
समानता का स्वरूप आवश्यकता, संभावना और सार्थकता के संबंध में यह समझा गया है कि मानव अपने परंपरा के रूप में नर-नारियों के संयुक्त विधि से प्रमाणित होना सर्वविदित है। मानव परंपरा और उसकी निरंतरता के लिये नर-नारियों का होना सहअस्तित्व सहज अभिव्यक्ति है। ऐसा वैभव जीवावस्था और प्राणावस्था में भी दृष्टव्य है। मानव परंपरा में एवं जीव परंपरा में भी जीवन का समानता होना पाया जाता है। जीवन अपने स्वीकृतिपूर्वक स्त्री या पुरूष शरीर को चलाता है। जीवन के रूप में न तो स्त्री होते हैं न पुरूष होते हैं। जीवन सदा ही जागृति का प्यासा है। इसे प्रमाणित करने के लिये सदा सदा ही प्रवृत्ति बनी ही रहती है। बारम्बार शरीर यात्रा का विफल होना भी जनसंख्या वृद्धि का कारण है। इसी के साथ साथ जीव कोटि के शरीरों की संख्या का घटना भी एक कारण है। क्योंकि इस धरती पर जितने जीवन जीवनी क्रम में और जागृति क्रम और जागृति में प्रमाणित होने के लिये नियतिविहित नियंत्रण रहता ही है। उसमें से मानव परंपरा में केवल जागृति क्रम परंपरा के स्थिति में ही बारम्बार शरीर यात्रा की स्थिति बनी हुई है। इन आधारों पर स्पष्ट हो जाता है जागृतिपूर्वक ही मानव परंपरा का जनसंख्या नियंत्रण हो पाता है। जागृति परंपरा के उपरान्त स्वाभाविक रूप में हर जीवन जागृत होने के लिये योग्य परंपरा बना रहता है। इसलिये हर जीवन जागृत होना सहज संभव हो जाता है। जीवन जागृति के उपरान्त शरीर यात्रा की आवश्यकता नहीं रहती है या न्यूनतम हो जाती है। जागृति की अर्हता, अपेक्षा, संभावना स्त्री-पुरूषों के लिये समान रूप में विद्यमान है। इसीलिये इनमें समानता की परंपरा और उपलब्धि होती है।
- मानव जागृतिपूर्वक ही सामाजिक होता है।
- मानव जागृतिपूर्वक सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी का निर्वाह करता है।
- मानव ही जागृतिपूर्वक सम्पूर्ण भ्रम से मुक्त होता है।
- मानव जागृतिपूर्वक ही ‘भ्रम ही बंधन का कारण होना’ समझ पाता है।