में निश्चित प्रजाति के अणुओं का आचरण और निश्चित रचना का आचरण अक्षुण्ण होना पाया जाता है। जैसे विभिन्न तत्वों के परमाणुओं से रचित अणु, अणु रचित पिण्ड रचनाओं का आचरण सर्वदेश-सर्वकाल में एक ही होता है।

प्राणावस्था में सम्पूर्ण रचनाएँ प्राणकोशाओं से रचित रहना विदित है। ऐसे प्राण कोषाएं मूलतः समान होते हुए रचना में विविधता होना देखा गया। इसका नियंत्रण बीजानुषंगीय विधि से सम्पन्न होता हुआ दिखाई पड़ता है। बीजों के आधार पर वृक्ष, वृक्षों के आधार पर बीज प्रमाणित होना सर्वविदित है। इनके सम्पूर्ण आचरण अपने-अपने प्रजाति के सम्पूर्णता में एक ही होता है। जैसे-बेल, दूब, पीपल, कमल, गुलाब आदि सभी पेड़-पौधे वृक्ष, पुष्प, लता और उन-उनमें विविध प्रजातियाँ बीज, वृक्ष, न्याय क्रम में नियंत्रित है। उन-उन प्रत्येक प्रजातियों के सम्पूर्ण एक-एक अपने आचरण के रूप में एक ही होते हैं।

जीव संसार अनेक प्रजातियों के रूप में दृष्टव्य है। प्रत्येक प्रजाति सहज जीव कितने भी संख्या में हो उन-उन का आचरण एक ही होना पाया जाता है। जैसे कुत्ता, बिल्ली, गाय, घोड़ा, गधा, हाथी आदि जीव संसार दृष्टव्य है। इन इनके आचरणों में स्थिरता, संतुलन स्पष्ट दिखाई पड़ता है। ये जीव संसार वंशानुषंगीय विधि से नियंत्रित और संतुलित होना पाया जाता है।

इन तथ्यों के अवलोकन से यह पता लगता है कि सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति रूपी सहअस्तित्व ही पूरकता विधि से पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था अपने में व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में होना अस्तित्व सहज वैभव नित्य वर्तमान है। इसी धरती में चारों अवस्थायें वर्तमान में दिखाई पड़ती हैं।

ज्ञानावस्था में मानव को स्वयं को पहचानने की आवश्यकता है। यह गौरवमय प्रतिष्ठा हर व्यक्ति में, से, के लिये स्पष्टतया समीचीन है। अभी मानव जीवन-ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान सहज विधि से जागृत पद प्रतिष्ठा को पहचानना स्वाभाविक हो गया है। ज्ञानावस्था का तात्पर्य ही है जागृति पूर्वक ही ‘त्व’ सहित व्यवस्था को प्रमाणित करता है। परंपरा के रूप में करता ही रहेगा। जागृति क्रम से जागृति की स्वीकृति ही संस्कार है। संस्कार की परिभाषा भी यही है पूर्णता के अर्थ में अनुभव बल, विचार शैली, जीने की कलायें पुनः अनुभव बल के लिये पुष्टिकारी होना ही मानवीयतापूर्ण संस्कार प्रतिष्ठा ऐसा जागृति रूपी संस्कार ही मानव का स्वत्व स्वतंत्रता व अधिकार के रूप में है क्योंकि जीवन में ही जागृति का मूल्यांकन होता है। मानव परंपरा में जागृति प्रमाणित होती है। यही, प्रमाण परंपरा का तात्पर्य है।

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