मत देना, यह मानव की विशालता का द्योतक है। मानव सदा-सदा ही विशालता क्रम में ही समाधान और तृप्ति सम्पन्न होता है। यही मनः स्वस्थता का तात्पर्य है।

सर्वतोमुखी समाधान और तृप्ति सहज निरंतरता सर्वमानव का अभीष्ट है। जागृत मानसिकता का संतुलन और सार्थक स्वरूप यही है। संतुलन ही मानव सहज स्वभाव गति है। ऐसे स्वभाव गति का प्रमाण स्वरूप स्वायत्त मानव और परिवार मानव ही है। स्वायत्त मानव, मानवीय शिक्षा-संस्कार पूर्वक सार्थक होता है। मानवीय शिक्षा-संस्कार परंपरा और शिक्षा ग्रहण करने की अपेक्षा हर मानव में निहित है।

मनः स्वस्थता विधि जागृति और जागृति पूर्णता का द्योतक है। ऐसी स्वस्थ मानसिकतापूर्वक परिवार मानव प्रतिष्ठा के रूप में मनाकार को साकार पूर्वक, समृद्धि सम्पन्न होते हैं। जागृत मानसिकता पूर्वक ही परिवारगत उत्पादन कार्य में एक-दूसरे का पूरक होना स्वाभाविक है। जीवन शक्तियाँ अक्षय होने और शरीर की और समाज गति की आवश्यकता अपने में सीमित है। इसी आधार पर हर परिवार अपने में समृद्ध होने की व्यवस्था सहज है। यह सहजता जागृति पूर्वक हर मानव में समझ रूप में, विचार रूप में, कार्य रूप में और व्यवहार रूप में प्रमाणित होना ही जागृत परंपरा का विशालता और उसका प्रमाण है। प्रमाण स्वयं में प्रभाव क्षेत्र का द्योतक है। इस क्रम में मानव अपने परिभाषा के अनुरूप मौलिक अधिकार सम्पन्न है।

1.3 मानव, अपनी परिभाषा के अनुरूप बौद्धिक समाधान तथा भौतिक समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व में प्रमाण का स्रोत व प्रमाण परंपरा है। यह मौलिक विधान है।

व्याख्या - अस्तित्व में प्रत्येक ‘एक’ अपने सम्पूर्णता सहित ‘क्रिया और व्याख्या’ है। क्योंकि प्रत्येक एक स्थिति-गति में होना पाया जाता है। स्थिति में क्रिया एवं गति में व्याख्या। स्थिति-गति सहित ही ‘त्व’ सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी (पूरकता या पूरक) होना पाया जाता है। प्रत्येक एक अपने स्थिति में क्रिया होना दिखाई पड़ता है। हर क्रिया अपने गति सहित स्थिति एवं स्थिति सहित गति के रूप में होना पाया जाता है। जैसे-एक जागृत मानव किसी भी स्थिति में कहीं भी हो, स्थिति-गति के संयुक्त रूप में होता है। मानव अपने में आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और प्रामाणिकता सहज गति और आस्वादन, तुलन, चिंतन, बोध एवं अनुभव सहज स्थिति के संयुक्त रूप में रहता ही है। इन्हीं का किसी न किसी स्थिति या गति सहज प्रकाशन शरीर के द्वारा सम्पन्न होता ही रहता है। इसी प्रकार यह धरती अपने स्थिति सहज रूप में अपने

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