शिक्षा-संस्कार व्यवस्था का स्वरूप :-

  • प्रत्येक मानव को व्यवहार व्यवसाय (उत्पादन) शिक्षा में पारंगत बनाना।
  • प्रत्येक मानव को व्यवसाय (तकनीकी शिक्षा) शिक्षा में पारंगत कर एक से अधिक व्यवसायों में स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर निपुण व कुशल बनाना।
  • प्रत्येक मानव को साक्षर बनाने।
  • “ग्राम सभा” पाठशाला की व्यवस्था, स्थानीय आवश्यकतानुसार करेगी।
  • आयु वर्ग के आधार पर शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था होगी।

शिक्षा की व्यवस्था निम्नलिखित कोटि के ग्रामवासियों के लिए की जावेगी।

  • बाल शिक्षा
  • बालक जो स्कूल छोड़ दिए हैं व दस वर्ष से अधिक आयु के हैं, ऐसे बच्चों को 30 वर्ष के अन्य अशिक्षित व्यक्तियों के साथ व्यवहार शिक्षा व व्यवसाय शिक्षा में पारंगत बनाने की व्यवस्था रहेगी।
  • 30 वर्ष की आयु से अधिक स्त्री पुरूषों को साक्षर बनाकर, व्यवहार शिक्षा में पारंगत बनाने की व्यवस्था होगी।
  • स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर आवश्यकता होने पर स्त्री पुरूषों के लिए अलग शिक्षा व्यवस्था होगी जो कि “स्वास्थ्य-संयम समिति” के साथ मिलकर कार्य करेगी।
  • व्यवसाय शिक्षा के लिए “शिक्षा-संस्कार समिति” “उत्पादन सलाहकार समिति” व “विनिमय-कोष समिति” के साथ मिलकर कार्य करेगी व सम्मिलित रूप से यह तय करेगी कि ग्राम की वर्तमान व भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर, किस-किस व्यक्ति को, किस-किस व्यवसाय की शिक्षा दी जाए। “विनिमय-कोष समिति” ऐसे उपायों की जानकारी देगी, जिनकी गाँव से बाहर अच्छी मांग है।
  • कृषि, पशुपालन, ग्राम शिल्प, कुटीर उद्योग, ग्रामोद्योग व सेवा में जो पहले से पारंगत है, उनके द्वारा ही अन्य ग्रामवासियों को पारंगत करने की व्यवस्था की जायेगी।
  • यदि उपर्युक्त शिक्षा में कभी उन्नत तकनीकी विज्ञान व प्रौद्योगिकी को समावेश करने की आवश्यकता होगी तो उसको समाविष्ट करने की व्यवस्था रहेगी।

व्यवहार शिक्षा के लिए “शिक्षा-संस्कार समिति” “स्वास्थ्य-संयम समिति” के साथ मिलकर कार्य करेगी।

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