गठनपूर्णता, जीवन पद, जीवनी क्रम (जीवावस्था का आचरण) विधि से और जीवन जागृति विधि से लाभ-हानि का कोई स्थान नहीं है। इतना ही नहीं विकास क्रम सहज प्राणावस्था में, से, के लिए होने वाले पूरकता उदात्तीकरण, रासायनिक भौतिक रचना-विरचना विधियों से भी संग्रह का भी कोई स्थान नहीं है। इस धरती में जितने भी रासायनिक भौतिक रचनाएँ सम्पन्न होते हैं, वह सब इसी धरती का समृद्धि के रूप में होना पाया जाता है।
अस्तित्व में कहीं लाभ-हानि का स्थान है या नहीं, इस तथ्य का परिशीलन किया गया। इस परिशीलन से विदित है अस्तित्व में, सहअस्तित्व में, विकास और संक्रमण में, जीवन और जीवन जागृति में, रासायनिक भौतिक रचना और विरचनाओं में लाभ-हानि का संकेत या प्रमाण न होकर अस्तित्व सहज रूप में ही सहअस्तित्व, समृद्धि सुस्पष्ट रूप में दिखाई पड़ती है। क्योंकि परमाणु समृद्ध होकर ही गठनपूर्ण होता है और संक्रमित होता है। फलस्वरूप चैतन्य इकाई के रूप में जीवन अणुबंधन-भारबंधन से मुक्त होकर आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रामाणिकता को व्यक्त, अभिव्यक्त, सम्प्रेषित, प्रकाशित करने योग्य हो पाता है। यह भी जीवन समृद्धि का ही द्योतक है। अर्थात् जीवन जागृति, जीवन समृद्धि का ही द्योतक है। यह भी सहअस्तित्व में ही सम्पन्न होना देखा जाता है। विकास क्रम में कार्यरत सभी रासायनिक, भौतिक वस्तु और द्रव्य सहअस्तित्व में ही अणु समृद्धि फलत: रासायनिक उर्मि के रूप में उदात्तीकरण और रचना-विरचनाएँ सम्पन्न होता हुआ देखने को मिलती है। यह भी समृद्धि, पूरकता और सहअस्तित्व के रूप में ही स्पष्ट है और अपने को व्याख्यायित करता है। इस प्रकार अस्तित्व सहज रूप में सहअस्तित्व और समृद्धि स्थापित है ही। मानव ही एक इकाई ज्ञानावस्था में वैभवित है। यह सहअस्तित्व सहज प्रतिष्ठा है। इस प्रतिष्ठा तक अस्तित्व में मानव के पुरुषार्थ-परमार्थ का, तकनीकी ज्ञान-विज्ञान के प्रयुक्ति के बिना ही यह प्रतिष्ठा स्थापित है ही। मानव का जो कुछ भी नियोजन-प्रयोजन, कार्य-व्यवहार है यह सब उक्त कहे पाँचों प्रकार से ही सम्पन्न होना देखा गया है। पुरुषार्थ का तात्पर्य उत्पादन कार्य से है। परमार्थ का तात्पर्य जागृतिपूर्णता से है। तकनीकी का तात्पर्य मानव सहज सामान्य आकांक्षा, महत्वाकांक्षा संबंधी वस्तुओं को उत्पादन करने की विधि विहित चित्रण, विश्लेषण सहित मानसिकता से है। ज्ञान का तात्पर्य जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने से है। विज्ञान का तात्पर्य तर्कसंगत विधि से ज्ञान को प्रवाहित करने का विचार है। तात्विक विधि से-कालवादी, क्रियावादी, निर्णयवादी (प्रमाणित और परिमाणित करने वाला) विचार विधि ही विज्ञान है। इससे सुस्पष्ट है मानव कृतियों का जो कुछ भी अक्षय बल है, शक्ति है वह जागृतिपूर्वक व्यक्त होने की स्थिति में इन्हीं पाँचों रूपों में कर्ता-भोक्ता के रूप में प्रमाणित हो पाता है। उक्त पाँचों प्रकारों से प्रमाणित होने वाली क्षमता ही स्वयं में दृष्टा पद का प्रमाण है। यह भी समृद्धि का ही द्योतक होना पाया जाता है और सहअस्तित्व में ही जागृति सम्पन्न होता है। इस विधि से मानव ही जागृत