मानव में ही श्रम पूँजी का विस्तार बहुआयामी प्रयोजन रूप में नियोजित होता हुआ आंकलित होता है। मानव निर्मित वस्तुएँ, इसी धरती में निहित द्रव्यों का ही वैभव को उजागर करने के क्रम में स्पष्ट है। एक सुई से लेकर महल तक, एक चक्के की गाड़ी से लेकर कई चक्के से चलने वाली यांत्रिकता को हाथ-पैर के दबावों से लुढ़कती हुई, चलती हुई क्रिया को, पानी, तेल, उष्मा के दबावों के सहारे चलने योग्य दूसरे नाम से गतिशील होने के योग्य तंत्रणाओं और बारूद से चलकर परमाणु तत्वों के दबाव से चलने वाले यान-वाहनों को मानव ने उपलब्ध किया। इसी यंत्र-तंत्रणा विधियों से चुम्बकीय विद्युत गति सूर्य ऊर्जा से परावर्तित उष्मा का संग्रहण और निश्चित धातु पदार्थ द्वारा यही सूर्य उष्मा का विद्युतीकरण के साथ-साथ हवा के दबाव प्रपात शक्ति का उपयोग विधि से विद्युतीकरण अथवा यंत्रीकरण विधियों से हम प्राप्त कर चुके हैं। इसी क्रम में दूरदर्शन, दूरश्रवण, दूरगमन यंत्रों जैसी उपलब्धियाँ मानव को उपलब्ध हो गया है। इन सबका उपयोग, सदुपयोग क्रम, भोग और बहुभोग क्रम मानव सम्मुख प्रस्तुत हो गया है। जिसमें से भोग और बहुभोग क्रम व्यापार और संग्रहण क्रम, शोषण और युद्ध क्रम के लिए मानव जाति सर्वाधिक रूप में दुरुपयोग करता हुआ देखा गया है। आंशिक रूप में सम्पर्क सूत्र समाचार गति के लिए भी ये सब उपयोगी सिद्ध हुए। इन सभी का सार्थकता व्यवस्था के अर्थ में उपयोग-सदुपयोग करना ही एकमात्र उपाए है। शासन गति के स्थान पर व्यवस्था गति, अ-सहअस्तित्ववादी शोषण गति से पोषण गति के लिए प्रयुक्त होना सदुपयोग है। एक ग्राम, ग्राम परिवार सभा से विश्व परिवार सभा तक और विश्व परिवार सभा से एक ग्राम परिवार सभा तक आवश्कतानुसार आदान-प्रदान गति को बनाए रखने के लिए यह सभी साधन उपयोगी, सदुपयोगी होना दिखाई पड़ती है। इसी नजरिया से ही यह निर्णय होता है संग्रहवाद और युद्धवाद के लिए सभी उपयोग मानव के अर्थ में, नैसर्गिकता के अर्थ में, पर्यावरण के अर्थ में निरर्थक होना समीक्षित होती है। यह निरर्थकता कई बार मनीषियों के मन में उद्गारों के रूप में आ चुकी है। इसका विकल्प न होने की स्थिति में यथास्थिति बनते ही आया।

तीनों प्रकार के वर्णित महत्वाकांक्षा संबंधी यंत्रों से व्यवस्था गति के रूप में ही नियतिक्रम स्वीकृति स्पष्ट होता है। नियति सहअस्तित्व सहज रूप में बनी हुई अथवा प्रकाशित स्वरूप है। ऐसे अनंत स्वरूप में से यह धरती भी एक स्वरूप है। इसी धरती में मानव भी एक स्वरूप है। यह तो मानव को भले प्रकार से पता लग चुकी है या स्पष्ट हो चुकी है कि मानव ही भ्रमित होकर धरती, जलवायु के प्रति अत्याचार करता है। इसका प्रमाण में यह देखने को मिला है कि पर्यावरण संतुलन के लिए उद्गार और आवाज योजनाओं के रूप में भी कुछ नौकरी करने वाले आदमी या नौकरी नहीं करने वाले मनीषी विशेषकर योजना के स्थल पर चर्चा करते हैं। उन सभी चर्चा का सार तत्व प्रदूषण को रोकने की न होकर कितना ज्यादा प्रदूषण में आदमी जी सकता है, इसका खोज किया जा रहा है। ऐसी नौकरशाही प्रदूषण नियंत्रण कार्य के मूल में भी

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