में श्रम नियोजन विधि प्रभावित रहा, जिससे मानवकृतियाँ प्रमाणित होती रही। आज के मानव में इस तथ्य को भी स्वीकारना-समझना संभव हो गया है कि ग्रह, गोल अपने वातारवण सहित अपने ही संपूर्ण रूप में विद्यमान हैं। इसी विधि से यह धरती भी अपने वातावरण सहित अपने संपूर्णता में कार्यरत रहता आया। जैसे ही धरती का पेट फाड़कर पेट में रहने योग्य वस्तु को बाहर कर दिया, इससे धरती का पेट बिगड़ना तो बना ही है। इसके साथ-साथ वातावरण का शक्ल भी बिगड़ता ही रहा। इतना ही नहीं जंगलों को अनानुपाती विधि से नष्ट कर दिया गया। और भी धरती का शक्ल बदलना हुआ। उल्लेखनीय तथ्य यह है इस धरती में निहित निश्चित अनुपाती खनिज वनस्पतियों के अनुपाती विधि से ही ऋतुकाल का नियंत्रण बनी रहती है। ऋतुकालों में प्रधानत: वर्षा, ग्रीष्म और शीतकाल के रूप में निश्चित माह की अवधियों को मानव ने स्वीकारा और इसका संतुलन से ही वनस्पतियों, जीव और मानव का अवस्थिति इस धरती पर सुखद सुन्दर होना देखा जाता है।

धरती का सौंदर्य विधान विकासक्रम में अथक श्रमपूर्वक सज-धज कर तैयार हुआ है। इसको ऐसा देखा जाता है कि पदार्थावस्था अपने अथक श्रम कार्य और सहअस्तित्व प्रभाव के संयोगवश ही ठोस, तरल, वायु के रूप में और भौतिक रासायनिक रचना-विरचना के रूप में दृष्टव्य है। इसका कोई काल गणना ही नहीं है। काल गणना का जो कुछ भी प्रयोजन, नियोजन मानव में, से, के लिए है। जीव कोटि में भी इस बात को उनके दिनचर्या के रूप में देखा जाता है। विकसित धरती के आचरण को ऋतुमान के रूप में देखा जाता है। यह तभी घटित हुआ है जबसे इस धरती में रासायनिक-भौतिक रचनाएँ-विरचनाओं परंपराओं के रूप में स्थापित हो चुकी हैं। आवर्तनशीलता का स्वरूप यह धरती के ऋतुकाल के रूप में है। जीवों में जीव शरीरों और मानव शरीरों के रचनाएँ-विरचना की आवर्तनशीलताएँ वंशानुषंगीयता के रूप में, सम्पूर्ण वनस्पति जगत में आवर्तनशील परंपराएँ बीजानुषंगीय विधियों से होना और सम्पूर्ण पदार्थ संसार परिणामानुषंगीय विधि से अपने-अपने व्यवस्थाओं को बनाए रखना देखा जाता है।

विज्ञान युग आने के उपरांत उन्माद त्रय का लोकव्यापीकरण कार्यों में शिक्षा और युद्ध एवं व्यापार तंत्र का सहायक होना देखा गया। यही मुख्य रूप में धरती को तंग करने में सर्वाधिक लोगों के सम्मतशील होने में प्रेरक सूत्र रहा। यह समीक्षीत होता है कि सर्वाधिक मानव मानस वन, खनिज अपहरण कार्य में सम्मत रहा। तभी यह घटना सम्पन्न हो पाया। यहाँ इस बात को स्मरण में लाने के उद्देश्य से ही जन मानस की ओर ध्यान दिलाना उचित समझा गया कि धरती का पेट फाड़ने की क्रिया को मानव ने ही सम्पन्न किया। इस धरती का या हरेक धरती का दो ध्रुव होना आंकलन गम्य है। मानव इस मुद्दे को पहचानता है। इस धरती के दो ध्रुवों को मानव भले प्रकार से समझ चुका है। इसी को दक्षिणी ध्रुव-उत्तरी ध्रुव कहा जाता है।

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