होने के उपरांत जो स्वरूप स्पष्ट हो पाती है, उसमें भी कहीं लाभ का स्थान न होकर सहअस्तित्व और समृद्धि ही दिखाई पड़ती है।
मानव ने जो कुछ भी लाभोन्माद, भोगोन्माद, कामोन्माद में ग्रसित होने का परंपरा बना लिया है इसके मूल में ईश्वरवाद और वस्तुवाद दोनों का अंतिम बिंदु कार्य-व्यवहार के रूप में भय और प्रलोभन ही रहा। प्रिय, हित, लाभात्मक दृष्टियाँ जागृति क्रम में क्रियाशील रहता रहा। न्याय, धर्म और सत्य के प्रति जागृत होने का प्रमाण प्राप्त नहीं हो पाया। इस विधि से मानव अपने कृतियों को कुछ भी कर पाया इन्हीं प्रिय, हित, लाभपूर्वक किया। इसके मूल में भय से मुक्ति, प्रलोभन से अनुरक्ति और आस्थाओं (न जानते हुए मानने के) के आधार पर रहस्यमूलक विधि से विरक्ति का भी चर्चा किए। कार्य-व्यवहार में भय और प्रलोभन ही हाथ लगता रहा। इसमें से मानव भय को नकारता रहा, प्रलोभनों को स्वीकारता रहा। फलस्वरूप तीनों उन्मादों से ग्रसित होना परंपरा में स्वीकार हुआ। इसी के साथ-साथ तृप्ति बिन्दु और आगे और आगे होता ही गया, जैसा मृगतृष्णा मरीचिका में होता है। इससे सुस्पष्ट हो गया है कि हम मानव उन्माद से कैसे ग्रसित हुए।
विचारणीय बिन्दु विश्व मानव के सम्मुख है खनिज तेल खनिज कोयला और खनिज वस्तु क्या इन वस्तुओं का मानव उत्पादन करता है? शोषण करता है? अपहरण करता है? और वन और वनोपज संबंध में भी विचार करना आवश्यक है। उक्त मुद्दे के संबंध में सर्वाधिक विचारशील मेधावी इस बात को स्वीकारते हैं कि खनिज तेल और कोयले से सर्वाधिक प्रदूषण होता है। स्वीकारते हुए इसको बनाए क्यों रखते हैं इसको पूछने पर यही उत्तर मिलता है हम विवश हैं, लोगों की आवश्यकता है, उद्योग बंद हो जाएंगे। अंतिम चोट में यही उद्गार आते हैं कि इसकी आवश्यकता है ही। इतने लोगों की आजीवका चलती है। यह सब बंद कर दें तो इतने लोगों को आजीविका कहाँ मिलेगी। इस प्रकार इस जटिल तर्क में आकर तेल और कोयले के उत्पादन को लक्ष्य बनाते हैं। तेल और कोयले की अवस्थिति जैसा भी धरती में समायी हुई है। उसको निकालने के क्रियाकलापों को देखने पर धरती का पेट फाड़कर इन चीजों को निकाला करते हैं।
यह तो सर्वविदित है कि यह धरती अपने में समृद्धि होने के क्रम में जितने भी प्रकार के खनिज पदार्थ हैं, उसे उन-उन स्तरों में बनाए रखने की जरूरत थी। उसी के अनुसार धरती अपने में समृद्धि हुई। इसमें मानव का कोई प्रखर प्रज्ञा का नियोजन नहीं रहा। यह भी इसके साथ देखने को मिलता है कि हर विकास बिन्दु में एक संतुलन प्रमाणित होता ही रहता है। इसी क्रम में यह धरती संतुलित रहते हुए अपने में समृद्ध हुई। समृद्ध होने के उपरांत ही अर्थात् पदार्थावस्था से प्राणावस्था, प्राणावस्था से जीवावस्था से सम्पन्न होने के उपरांत ही ज्ञानावस्था का मानव अपने को बनाए रखने के लिए कार्यक्रमों को आरंभ किया। इसी क्रम