मानव इकाई में से कुछ लोग जिनको ज्यादा शक्तिशाली कहा जाता है, वे ही शोषण करने वालों की संख्या में गण्य है। अन्य सभी शोषित होते हैं। आदिकाल से यह आंकलित तथ्य है कि शक्ति केन्द्रित शासन ही इसका मूल तत्व है और ऐसे शासनाधिकार प्राप्त मुट्ठी भर लोग ही इसके धारक-वाहक है। यही धारक-वाहक शक्ति केन्द्रित शासन को सर्वोपरि होने की मान्यता के आधार पर शोषण कार्य को बुलंद करते जाते हैं। इसको देखने पर पता चलता है कि शासन अपने स्वरूप में जड़ रूप में एक वांङ्गमय के रूप में सभी राज्यों का संविधान दिखाई पड़ती है। यह गलती को गलती से, अपराध को अपराध से और युद्ध को युद्ध से रोकने के आशय सम्पन्न होना सर्वविदित है। दूसरे भाषा से इसी तत्व को इस प्रकार से कह सकते हैं कि गलती, अपराध और युद्ध को रोकना राज्य के लिए सर्वोपरि आवश्यकता और सम्मान है। इसलिए सभी संविधान शक्ति केन्द्रित शासन के ध्वनि में लिप्त है। इसी क्रम में अधिकारों का बंटवारा, केन्द्रीय अधिकार से सूत्रित रहने के क्रम में शासन-व्यवस्था का ताना-बाना का होना देखा गया है। इस प्रकार शासन मानसिकता शक्ति प्रयोग अधिकार सम्पन्नता के साथ ही अधिकारी व्यक्तियों को देखने को मिलता है। इस विधि से अर्थात् शक्ति प्रयोग विधि से प्रताड़ित क्षुब्ध जन मानस में विद्रोहवादी उर्मियाँ अथवा प्रवृत्तियाँ प्रवाहित होना देखा गया है। यही संघर्ष का मूल तत्व है। यह वंशानुषंगीय एकाधिकार प्राप्त राजा के रूप में शासन अर्थात् शक्ति केन्द्रित शासन में और बहुमत प्राप्त अथवा जनादेश प्राप्त जन-प्रतिनिधियों के हाथों शक्ति केन्द्रित शासन संचालन में भी देखा गया है। इन सभी में सुविधा संग्रह आशातीत आश्वासन और सत्ता-संघर्ष, द्रोह-विद्रोह का प्रकटन बना ही है।
शक्ति केन्द्रित आधारों पर पंचायती राज्यों, ग्राम पंचायतों, ग्राम समितियों के नाम से, रूप से सोचा गया है। यह सूझबूझ भी यथावत् शक्ति केन्द्रित होने के कारण शासन संघर्ष, द्रोह-विद्रोह प्रकट होना देखा गया। अतएव इन सब का विकल्प सार्वभौम व्यवस्था मानसिकता ज्ञान विवेक विज्ञान पूर्वक सम्पन्न होना ही एक मात्र शरण है। ऐसी शरणस्थली को पाना, सम्पन्न होना, समृद्धि होना, इसका धारक वाहकता में हर व्यक्ति का भागीदार होना ही इसका गति है। ऐसी गति सम्पन्नता ही मानवाधिकार कहलाता है। यही चेतना विकास मूल्य शिक्षा पूर्वक सफल होने का प्रस्ताव है।
मानवाधिकार की चर्चा-परिचर्चा अंतर्राष्ट्रीय अथवा विश्व मंच पर होता हुआ देखने को मिलता है। यह सारे चर्चा पुन: पैसे पर ही आधारित होना देखा गया। दुखी देश समुदाय खासकर परेशानी से घिर जाने पर उन्हें राहत देने, पहुँचाने की कार्य करना चर्चा का प्रधान मुद्दा है। इसके लिए सभी देश सम्मत होते भी हैं। इसी के साथ यह भी चर्चाएँ मानवाधिकार के मंच पर गुजरती हुई देखी जाती है। लोकमानस के पटल पर ही कुछ तथ्यों को ज्ञापित करने का कार्य भी करते हैं। हर देश की सीमाएँ जो बहुदेशों से स्वीकृत रहता है,