उस सीमा रेखाएँ उन्हीं-उन्हीं देशों का संप्रभुता, प्रभुसत्ता प्रभावित देश मानी जाती है। इसका उल्लंघन भी मानवाधिकार का खिलाफ मानी जाती है। कुल मिलकार मानवाधिकार संस्था विपदा-आपदाग्रस्त समुदायों, देशों के निवासियों को राहत पहुँचाने की मंशा और क्रियाकलापों को सम्पन्न करता हुआ देखा जाता है।

आपदा-विपदाएँ सभी देशों में प्रकारांतर से गुजरती ही रहती है। जैसे भूकम्प, असाध्य रोग दरिद्रता, शरीर व्यवस्था दोष (एड्स), युद्ध, बाढ़, चक्रवात और तूफान। ऐसे विपदाओं से घिरे हुए लोगों को आहार, वस्त्र, आवास संबंधी और दवाईयों को उपलब्ध कराने के कार्यक्रम मानवाधिकार का प्रमाण मानी गई है। यथासंभव यह सब कार्यों को सम्पन्न करते भी हैं। इसके लिए सभी देश दान मानसिकता को रखने वाले सभी संस्थाएँ इसमें वित्त सहायता का स्रोत बना हुआ देखने को मिलता है।

मानवाधिकार का हकदार हर मानव का होना ध्वनित होता है। इसके लिए आशय के रूप में सुख-सुविधा के साथ जीना हर मानव को स्वीकृत है। अभी तक सभी देश, सभी समुदायों में यही वादग्रस्त होकर रह गया है। सुविधा के मुद्दे पर हर देश और समुदायों के बीच और हर देश-समुदाय में विविध मानसिकता सम्पन्न व्यक्तियों में सभी का सुविधा और सुख का निश्चयन नहीं हो पाया। यद्यपि विद्वानों के मंचों में चर्चा के रूप में और सभाओं में भाषण के रूप में सुख-सुविधा की बात सुनने को मिलती है कि सबको उपलब्ध होना चाहिए। बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक सुख-सुविधा में प्रमाणित स्वरूप और मानसिकता सुस्पष्ट रूप में कहीं भी, किसी भी व्यक्ति में प्रमाणित नहीं हो पाती। इसका तात्पर्य यही हुआ अभी तक हम एक ‘सार्वभौम मानव’ जो समाधान, समृद्धि, अभय और सहअस्तित्व को प्रमाणित करता है, उनको पाकर उनके जैसा हर व्यक्ति मानवाधिकार सम्पन्न स्वरूप से ख्यात होना संभव नहीं हो पाया। इसकी आवश्यकता को प्रकारांतर से परिकल्पना में लाते ही रहे और इस मान्यता से शुभेच्छा सम्पन्न संस्थाएँ काम करते रहे हैं कि यथा स्थितियाँ सुख-चैन का आधार है। यथा स्थितियों में जो विविधता है इसके कारणों को कुछ लोग नैसर्गिक मानते है, कुछ लोग इसको कर्मों का फल मानते हैं, कुछ लोग इन घटनाओं को पाप-पुण्य मानते हैं और कुछ लोग इसे राजनैतिक मंशा मानते हैं।

नैसर्गिकता को मानव जागृतिपूर्वक देखने की स्थिति में पता लगता है कि ब्रह्मांडीय किरणों सहित यह धरती ही प्रत्येक व्यक्ति के लिए नैसर्गिक है। ब्रह्मांडीय किरण क्रम में अनंत ग्रह-गोल, सौर व्यूह का परस्पर आदान-प्रदान अथवा परस्परता में प्रतिबिम्ब रहता ही है। हर बिम्ब का प्रतिबिम्ब रहता ही है। प्रतिबिम्ब अपने अस्तित्व को प्रस्तुत करता है। अस्तित्व नित्य वर्तमान, स्थिर और विकास और जागृति निश्चित होने के आधार पर सभी बिम्ब अपने-अपने आकार-प्रकार, वातावरण सहित अर्थात् हर वस्तु का अपना प्रभाव क्षेत्र बना रहता है। इसी आधार पर हर व्यक्ति अपने प्रभाव सीमा सहित एक-दूसरे पर प्रतिबिंबित रहता

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