सम्मति प्राचीन काल से भी स्वीकृत है। भ्रम निवारण की अथवा जागृति के लिए मार्ग प्रशस्त न होने के फलस्वरूप निषेधनी को बताकर ज्ञान होने की आशा बंधाए रखे थे। ऐसी आशा के अनुरूप घटनाएँ घटित नहीं हो पाई, क्योंकि जागृति की आवश्यकता रही।
सम्पूर्ण भ्रम का विकल्प अनुसंधान-शोध क्रम में ही समीचीन रहा है। प्रत्येक मानव अस्तित्व में होते हुए अस्तित्व ज्ञान ही न हो पाना, अर्थात् अस्तित्व समझ में न आना, न आने का प्रमाण परंपरा में ख्यात, प्रख्यात प्रमाणित न हो पाना। हर मानव वर्तमान में होते हुए नित्य वर्तमानता को स्वीकार नहीं पाना, जीवन हर मानव में कार्यरत रहते हुए जीवन ज्ञान सम्पन्न नहीं हो पाना प्रधानत: यह तीन बिन्दुएँ स्पष्ट नहीं हो पाना ही सम्पूर्ण प्रकार के परम्परा में भ्रम का कारण रहा। मानव का ही अपेक्षा के अनुरूप अब हम जीवन ज्ञान, सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान पूर्वक जागृति का प्रमाणित कर सकेंगे। जागृति का प्रमाण मानवीयतापूर्ण आचरण ही है। मानवत्व का प्रमाण भी यही है। मानव परंपरा का सूत्र भी यही है। मानव में मानवीयतापूर्ण सूत्र ही परिवारमूलक स्वराज्य में वैभवित होना अति समीचीन हो गई है। इसके लिए भी यही ज्ञान, दर्शन और आचरण यह सभी उपलब्धियाँ अस्तित्वमूलक मानव केन्द्रित विधि से सहज सुलभ हुआ है।
परिवार मानव का स्वरूप उसका गति के संबंध में हम स्पष्ट हुए हैं। परिवार मानव का स्वभाव-गति परिवार में प्रमाणित होना ही है। परिवार में प्रमाणित होने का तात्पर्य परिवार में सहअस्तित्व, परिवार में समाधान, समृद्धि सम्पन्न रहने से है। इसके फलस्वरूप परिवार में समाहित सभी व्यक्तियों के साथ परस्पर पूर्ण विश्वास ही परिवार का स्वरूप है। ऐसा स्वरूप अपने आप में एक गति का आधार बनना विकास-सहज है। परिवार का गति एक ग्राम परिवार का स्वरूप प्रदान करता है, फलस्वरूप सम्पूर्ण ग्राम वासियों बनाम परिवारों में, से, के लिए उक्त चारों प्रकार का शुभ बहने लगती है। इससे यह भी पता लगता है, शुभ रूप में ही नित्य वैभव एवं गति है। इसके विपरीत भ्रमित प्रयास कुण्ठित, निराशित, प्रताड़ित होना अवश्यंभावी है। यह घटना पूर्वावर्ती भ्रमित परम्पराओं के चलते मानव जाति भुगत गया है।
यह समीक्षा उक्त प्रकार से शुभ की स्थिति-गति क्रम विश्व परिवार तक संभाव्य है और आवश्यकता भी है। तभी इस धरती का संतुलन विधि, सहअस्तित्व विधि, अखण्ड समाज विधि, सार्वभौम व्यवस्था विधि, उक्त शुभ परंपरा में सार्थक होना स्पष्टतया विदित होता है।
परिवार और व्यवस्था अविभाज्य है। परिवार हो, व्यवस्था नहीं हो और व्यवस्था हो परिवार नहीं हो, ये दोनों स्थितियाँ भ्रम का द्योतक है। पूर्वावर्ती आदर्शवादी और भौतिकवादी विचारों के आधार पर सभी शक्ति केन्द्रित शासन अवधारणाएँ परिवार के साथ सूत्रित होना संभव नहीं हो पाई। हर परिवार में कुछ संख्यात्मक