मानवीयतावूर्ण आचरण, विचारपूर्वक समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व का अनुभव सर्वसुलभ होना भावी और समीचीन है।

विविधता का अर्थात् धनी-निर्धनी, विद्वान-मूर्ख, बली-दुबर्ली, ज्ञानी-अज्ञानी, इन चारों विधाओं में मान्य विविधताएँ कर्मों के फल के कारण है, ऐसा मानना देखा गया है। ऐसी मान्यता विशेषकर रहस्यमयी आदर्शवादी विचारों परिकथाओं के रूप में देखने को मिली। यह परंपरा में स्थान बनाए रखा था।

हर वस्तु जब क्रियाशील है, मानव को निष्क्रिय रहना संभव है ही नहीं। मानव भी क्रियाशील है। मानव में कर्मठता को देखने के लिए ऊपर कहे चार रूपों में एक-दूसरे को देखने की इच्छा सदा बना ही रहता है। इसे मानवाभिलाषा भी कहा जा सकता है। क्योंकि हर व्यक्ति समृद्धि, समाधान, अभय, सहअस्तित्वशील रहना चाहता ही है। यही सर्व जनमानस का शुभेच्छा है। इन शुभेच्छाओं के आधार पर ही एक दूसरे से अपेक्षा भी करता है। इन चारों प्रकार से आशित शुभेच्छाएँ सर्व मानव में प्रमाणित होने पर्यन्त अनुसंधान स्रोत प्रभावित रहना पाया जाता है। सर्व मानव में अभी प्रमाणित होने की आवश्यकता बलवती हुई है। इसका कारण सब पहले से ज्ञात कर चुके हैं।

अभी तक विविध प्रकार की परंपराएँ स्थापित रहते हुए भी सार्वभौम शुभ किसी परंपरा में स्थापित नहीं हुई। इसलिए किसी परम्परा को मानवीयतापूर्ण परम्परा में ध्यान देने की आवश्यकता समीचीन हुई। हर परम्परा प्रकारान्तर से भ्रमित रहने के उपरांत ही असमानताएँ भ्रमात्मक कर्मों का प्रेरणा और प्रभाव शिक्षा, संस्कार, संविधान, व्यवस्था और प्रचार तंत्र के मंशा पर आधारित रहती है। अंततोगत्वा संग्रह और भोग ही मानव परंपरा को हाथ लगी। इन दोनों मुद्दों पर ज्यादा और कम की बात प्रभावित होता ही है। इन दोनों विधाओं में तृप्ति बिन्दु कहीं मिलता नहीं है। यही तथ्य परंपरागत उक्त पाँचों प्रकार के प्रयास भ्रमात्मक होने का प्रमाण है। उल्लेखनीय घटना यही है सर्वमानव शुभ चाहते हुए भी भ्रम से ग्रसित हो जाता है। इसी भ्रमवश ज्यादा और कम वाला भूत भय और प्रलोभन के आधार पर ही बन बैठा है। इसका निराकरण, तृप्ति स्थली को परम्परा में पहचानना ही है, निर्वाह करना ही है। जानना-मानना ही है।

इसके तृप्ति स्थली को हर मानव इस प्रकार देख सकता है और जी सकता है कि स्वयं में विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवसाय (उत्पादन) में स्वावलंबी, व्यवहार में सामाजिक होने के उपरांत व्यक्ति स्वायत्त होता है और परिवार मानव के रूप में प्रमाणित होता है। यही वांछित, आवश्यकीय, सार्वभौम मानव का स्वरूप और गति स्पष्ट हो जाती है। परिवार मानव में राग-द्वेष का पूर्णतया उन्मूलन हो जाता है। समझदारी का स्त्रोत मानवीयता पूर्ण शिक्षा-संस्कार ही है। जागृति के अनन्तर भ्रम का प्रभाव निष्प्रभावी होना स्वाभाविक है। भ्रमवश ही राग द्वेष से मानव पीड़ित रहता है। इस बात का

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