उच्चारण के अनन्तर रूप, कार्य, व्यवहार, आचरणों के आधार पर गुण, स्वभावों को पहचानना संभव हो जाता है। यह हर शिशु में कार्यरत जीवन सहज महिमा है। धर्म बोध अध्ययन विधि से सम्पन्न हुआ रहता ही है। गुण, स्वभाव, कार्य व्यवहार में निहित रहता है। उसके प्रमाणों, साक्ष्यों के आधार पर व्यवस्था अथवा समाधान कारक होना मूल्यांकित होता है। यही मूल्य और मूल्यांकन का महिमा है। उभय तृप्ति पाने का विधि भी यही है। अतएव शिशु, बाल्य, किशोर अवस्थाओं से ही भाई-बहनों और मित्रों का नैसर्गिकता और उसकी निरंतरता होने के आधार पर परस्पर मूल्यांकन अति सहज है। मूल्यांकन वास्तविक और सहायतापूर्ण होना स्वाभाविक है। यही पूरकता का परम उद्देश्य भी है। इस विधि से सुस्पष्ट है मित्र एवं भाई-बहन का संबंध सदा-सदा ही मूल्यांकन प्रणाली में गतित होना पाया जाता है। उभय जागृति के लिये यही सर्वोत्तम प्रणाली है। स्वाभाविक रूप में मानव परंपरा में एक भाई को एक बहन, एक मित्र को एक मित्र समीचीन रहता ही है।

3. मित्र-मित्र संबंध :- जीवन ज्ञान सम्पन्नता के अनन्तर सुस्पष्ट हो जाता है कि सभी संबंध जीवन जागृति और उसका प्रमाणीकरण प्रणाली का ही पहचान है। जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान सम्पन्न होने के उपरान्त सम्पूर्ण प्रकार के संबंधों, मूल्यों, मूल्यांकनों और उभयतृप्ति का पहचान, स्वीकृति मानसिकता, गति, प्रयोजन पुनः पहचान, मूल्यांकन क्रम आवर्तित रहता ही है। यह अनुस्यूत प्रक्रिया है। जीवन ही दृष्टा-कर्ता-भोक्ता होने का तथ्य जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान में पारंगत होने के फलन में सहअस्तित्व में वर्तमानित रहता है। इसी आधार पर मित्र संबंध परस्पर अभ्युदय के लिये कामना, कार्य, मूल्यांकन करने में समर्थ रहता ही है। मित्र संबंध में भाई-भाई, बहन-बहन संबंध के सदृश जाँच, पड़ताल, विश्लेषण, निष्कर्ष, मूल्यांकन सहायक होना पाया जाता है। दूसरे भाषा में सहायक होना ही सार्थकता है। हर संबंध कम से कम दो व्यक्तियों के बीच होना पाया जाता है। भाई और मित्र संबंध में समानता है। इसको आमूलतः विश्लेषण करने पर लड़कों के साथ लड़कों की मित्रता, लड़कियों की मित्रता लड़कियों से हो पाता है। क्योंकि आशय बहिन-बहिन और भाई-भाई का ही संबंध है। इस संबंध का पावन रूप उभय जागृति, कर्तव्य, दायित्व उसकी गति प्रयोजन और उसका मूल्यांकन विधि से ही मित्रता और भाई-बहन संबंध सदा-सदा ही मानव परंपरा में पावन रूप में उपकार विधि और उसका शोध, निष्कर्ष को प्रस्तुत करते ही रहेंगे। पावन का तात्पर्य व्यवस्था के अर्थ में है। यही उपकार का स्वरूप है। यद्यपि सभी संबंधों में आशित, इच्छित, लक्षित और वांछित तथ्य समाधान, समृद्धि अभय, सहअस्तित्व ही है। इस आशय अथवा आवश्यकता की आपूर्ति और इसके

Page 117 of 179