बराबर रचना व्यवस्था। हर रचनाएँ विरचित होते हुए पुनःरचना के लिये पूरक होना पाया जाता है।

जीवन और शरीर संबंध उसका निर्वाह वंशानुषंगीयता और व्यवस्था; जीवन और शरीर का परस्पर संबंध + जीवन जागृति सहज निर्वाह = संस्कारनुषंगीय अभिव्यक्ति एवं मानवीय व्यवस्था है।

मानवीयता सहज सभी संबंधों का प्रधान प्रमाण व्यवस्था के रूप में जीना, समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना ही है। इस परम लक्ष्य को सदा-सदा परंपरा निर्वाह करने के क्रम में ही सभी प्रकार के संबंधों को पहचानना मानव में, से, के लिये अनिवार्य है। इससे स्पष्ट हुआ है कि अस्तित्व ही सहअस्तित्व के रूप में व्यवस्था में भागीदारी को प्रकाशित करता है। अस्तित्व में मानव अविभाज्य होने के कारण मानव अपने मानवत्व सहित व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करना ही जागृति, समाधान, सर्वतोमुखी समाधान, व्यवस्था उसकी निरंतरता ही मानव परंपरा में परम प्रयोजन है। यही महिमा सर्वमानव शुभ के रूप में प्रमाणित हो जाती है। यही सहअस्तित्व पूर्ण परिवार, समाज पुनः अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था स्वरूप में स्पष्ट होना पाया जाता है। इन्हीं उद्देश्यों विधियों में जागृत होना ही शिक्षा-संस्कार, संबंध, संबंधों में परस्पर अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, कार्य-व्यवहार का प्रकाशन ही प्रधान रूप में मित्र, भाई-बहिन संबंधों में आचरण, परीक्षण, मूल्यांकन के लिये तथ्य है।

उक्त तथ्यों का हृदयंगम और पारंगत विधियों से परिवार मानव के रूप में प्रमाणित होना स्वाभाविक है। यही मानव परंपरा का अनिवार्य आवश्यकता, सार्थकता है। इस प्रकार हर मित्र, हर भाई, हर बहिन समृद्धिपूर्वक व्यवस्था में जीना ही उद्देश्य है। इस विधि से भाई-बहन संबंधों में शिशु कौमार्य अवस्था से ही पूरकता को पहचानने का क्रम बना हुआ है। अन्य संबंधों में कुछ आयु के बाद ही पूरकता संबंध बन पाता है। यथा गुरू-शिष्य संबंध कुछ आयु के बाद आरंभ होता है। पति-पत्नी संबंध कुछ आयु के बाद आरंभ होता है।

भाई-बहन संबध शिशुकाल से ही इंगित निर्देशित हुआ रहता है। इनमें संस्कारों का समावेश रहना सार्वभौम व्यवस्था अखण्ड समाज सहज मानसिकता के लिए अर्पित होता ही रहता है। जैसा - हर लड़कियों को बहन के रूप में संबोधन करने का क्रम चाहे अपने परिवार की हो चाहे अड़ोस पड़ोस, गाँव की क्यों न हो और भाई का संबोधन से संबंधों का प्राथमिक अथवा आरंभिक परिचय इंगित होना पाया जाता है फलस्वरूप क्रम से विचार, इच्छा, चिंतन, बोध और अनुभव में प्रमाणित होना पाया जाता है। संबोधन आरंभिक संस्कार है, इसका प्रधान क्रिया उच्चारण है।

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