पाया जाता है। जीवावस्था में अस्तित्व, पुष्टि सहित जीने की आशा धर्म विद्यमान होना देखा गया है। इसलिये सम्पूर्ण जीवावस्था जीवनीक्रम सहित परिणाम, पुष्टि सहित जीने की आशा सहज लक्ष्य रूप में होना पाया जाता है। इसलिये जीवावस्था में जीने की आशा, लक्ष्य, सूत्र और व्याख्या प्रमाणित है। मानव में अस्तित्व, पुष्टि, जीने की आशा सहित सुख धर्मीयता स्पष्ट है। इसी के साथ अपरिष्कृत, परिष्कृतपूर्ण संचेतन सहज कार्यकलाप का वर्गीकरण भ्रम व जागृति रूप में करता हुआ मानव अपने आप में स्पष्ट है। ऐसे मानव में स्वाभाविक रूप में सुख लक्ष्य, सूत्र व्याख्या का होना स्वाभाविक रहा है। ऐसी सुख लक्ष्य परिष्कृत संचेतना अथवा परिष्कृत पूर्ण संचेतना सहज विधि से समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व में अनुभव प्रमाण सहित प्रमाणित होना पाया जाता है। मानव अपने आप में सुख धर्मी होने के आधार पर ही मानव संचेतना सहज अर्थात् जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने सहज विधि से समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व में अनुभव प्रमाण रूप में दायित्व और कर्तव्यों का निर्वाह होना सहज है। इसी क्रम में जागृति सहज विधि से ही दायित्व और कर्तव्यों को सम्पन्न करना स्वत्व व स्वतंत्रता का द्योतक है। क्योंकि मानव का मानवीयतापूर्ण आचरण मानव में, से, के लिये स्वतंत्रता का प्रमाण है।

प्रमाण सहित ही हर मानव का सुखी होना सतत समीचीन है। सम्पूर्ण मानव में, से, के लिये प्रामाणिकता और प्रमाण ही सुख का स्रोत, सूत्र और व्याख्या है। जीवन ही जागृति पूर्वक मानव परंपरा में सुख का स्रोत होना पहले से स्पष्ट हो चुका है। जागृति के पहले जीवन भ्रमित रहता है। भ्रमवश ही मानव जीवन बंधन में होता है। ऐसा बंधन भ्रमित आशा, विचार, इच्छा के रूप में होना सर्वेक्षित है। न्याय, धर्म (सर्वतोमुखी समाधान), सत्य (अस्तित्व में अनुभव) सहज विधि से प्रमाणित पूर्वक ही जागृत होना देखा गया है। जागृति पूर्वक ही हर मानव दायित्व और कर्तव्य को निर्वाह कर पाता है और सुखी होता है। मौलिक अधिकार का प्रयोग अपने आप में जागृति पूर्वक ही सम्पन्न होता है। हर मानव जागृति के लिये पात्र है। जागृति को परंपरा के रूप में स्थापित करना मानवीय शिक्षा-संस्कार पूर्वक सहज है। इस विधि से हर मानव जागृत होने का स्रोत जागृत मानव परंपरा ही है। यह स्पष्ट होता है।

जागृति सहज कार्यक्रम दायित्व और कर्तव्य के आधार पर ही सुयोजित हो पाता है। ऐसे सुयोजन परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था के रूप में सर्वसुलभ होता है। जागृति पूर्वक जीने की कला ही सुयोजना का साक्ष्य है। परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में व्यवस्थापूर्वक ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी सम्पन्न होना पाया जाता है। इसी सत्यवश, यही सत्यता मानव

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