करना एक आवश्यकता और विधि है। इसका मूल्यांकन हर स्थिति में होना ही समाज है। समाज का परिभाषा भी इसी तथ्य को इंगित कराता है कि पूर्णता के अर्थ में गतिशीलता ही समाज है। पूर्णता का स्वरूप मानव परंपरा में मानवत्व सहित अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था सूत्र और व्याख्या स्वरूप ही है। सार्वभौम व्यवस्था स्वरूप स्वयं में परिवार मूलक स्वराज्य सभा विधि से पाँचों आयाम सहित गतिशील रहना स्पष्ट है। नैसर्गिक संबंध और मानव संबंध और उसमें निहित प्रयोजनों को सार्थक बनाने के क्रियाकलापों को निर्वाह नाम दिया गया है। इसका सार्थक गति मानव अपने जागृत संचेतना पूर्वक ही अपने स्वत्व, स्वतंत्रता और अधिकारों को अक्षुण्ण बनाए रखता है। इसकी स्वीकृति सर्व मानवों में होना पाया जाता है। इसे व्यवहार पूर्वक ही हर मानव प्रमाणित करता है। अतएव मानव में, से, के लिये स्वत्व, स्वतंत्रता और अधिकार का स्वरूप जागृत संचेतना ही है। इसमें हर व्यक्ति पारंगत रहना ही परंपरा का वैभव है।

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