शारीरिक स्वस्थता और जीवन स्वस्थता का स्वरूप मानव में ही अपेक्षित है। अर्थात् मानव परंपरा में अपेक्षित है। यह पीढ़ी से पीढ़ी में अपेक्षा का आधार है। इसी नियति सहज सहअस्तित्व सहज आधारवश ही मानव अपने संचेतना को प्रमाणित करने के लिये तत्पर है। इसकी सार्थकता का स्वरूप प्रदान करने का कार्य मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार परंपरा ही आहूत करेगा। आहूतता का तात्पर्य मानवीयता सहज अपेक्षा के अनुरूप अवधारणाओं को पीढ़ी से पीढ़ी में स्थापित करने का क्रियाकलाप।

मानव परंपरा भी नियति क्रम विधि से परंपरा के रूप में अक्षुण्ण है। अतएव मानव परंपरा में मानवत्व अक्षुण्ण होना नित्य समीचीन है। यही मानव सहज स्वत्व, स्वतंत्रता और अधिकार की व्याख्या है। दूसरे विधि से यही समझदारी अनुरूप विचार शैली के अनुरूप कार्य-व्यवहार और कार्य-व्यवहार का फल-परिणाम का सटीक मूल्यांकन पुनः समझदारी की पुष्टि, यही आवर्तनशील होना पाया जाता है। इसी क्रम में समझदारी को स्वत्व के रूप में, विचार शैली को स्वतंत्रता के रूप में, कार्य-व्यवहारों का अधिकारों के रूप में वर्तमान होना पाया जाता है। इस प्रकार जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना ही स्वत्व, स्वतंत्रता और अधिकार है। यह हर मानव में जागृति पूर्वक वर्तमान होना ही/रहना ही मानव परंपरा का वैभव है। यही वैभव परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था के रूप में प्रमाणित रहता है। व्यवस्था में भागीदारी स्वयं समाधान मानव धर्म का द्योतक है। न्याय प्रदायी विधियाँ समाज का द्योतक है। जागृति सहज सम्पूर्ण प्रमाण सत्य का द्योतक है। इस प्रकार न्याय, धर्म, सत्य पूर्ण जीवन क्रियाकलाप जागृत संचेतना के रूप में नित्य प्रमाण होता है। ऐसा स्वत्व, स्वतंत्रता, अधिकार हर व्यक्ति के लिये, हर परिवार के लिये, सम्पूर्ण मानव के लिये समान रूप में समीचीन है।

जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने की सम्पूर्ण वस्तु सहअस्तित्व रूपी परम सत्य ही संपूर्ण वस्तु, अस्तित्व में परमाणु में विकास क्रम, विकास, परमाणु अपने में गठनपूर्णता के फलस्वरूप चैतन्य पद में संक्रमण ‘जीवन पद’, जीवनी क्रम में, जीवावस्था में, जीवन जागृति क्रम, जागृति और उसका परंपरा जागृत मानव परंपरा में और रासायनिक-भौतिक रचना-विरचनाएं है। इन सभी मुद्दों का अध्ययन पूर्वाध्यायों में स्पष्ट हुआ है।

जानने, मानने का अधिकार जागृत मानव में ही प्रमाणित होता है। ऐसा जानने, मानने के आधार पर संबंधों का पहचान होता है। हर संबंध में निश्चित प्रयोजन स्वीकृत रहता है। उन संबंधों में लक्षित प्रयोजनों को निर्वाह करना ही समाज सूत्र का आधार है। इसीलिये पहचानना, निर्वाह

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