ग्राम में हर वर्ष सम्पन्न होना स्वाभाविक है आवश्यकता भी है क्योंकि अग्रिम पीढ़ी के लिये यह उत्सव प्रेरणा स्रोत बनकर ही रहता है। संस्कार मर्यादा बोध कराने वाला पारंगत आचार्य ही रहेंगे।
स्नातक अवधि में पहुँचा हुआ सभी गाँव के स्नातकों का संयुक्त उत्सव सभा सम्पन्न होना भी आवश्यकता है। यह शिक्षण संस्था में ही समारोह रूप में सम्पन्न होना सहज है। इस उत्सव का प्रयोजन परस्पर स्नातकों का सत्यापन, श्रवण, साथ में अध्ययन अवधि में बिताये गये दिनों की स्मृति के साथ मूल्यांकित करने का शुभ अवसर समीचीन रहता है। इस अवसर के आधार पर हर एक स्नातक को अन्य स्नातक सत्यापन के आधार पर प्रामाणिकता को मूल्यांकित करने का अवसर बना रहता है। इस अवसर का सटीक प्रस्तुति और सदुपयोग उत्सव के स्वरूप में वैभवित होना स्वाभाविक है। इन्हीं के साथ इनके सभी आचार्यों का मूल्यांकन और आशीष, आशीष का तात्पर्य स्नातक में जो स्वायत्तता स्थापित हुई है वह नित्य फलवती होने स्वायत्त मानव, समाज मानव, व्यवस्था मानव के रूप में प्रमाणित होने के आशयों को व्यक्त करने के रूप में उत्सव अपने आप में शुभ, सुन्दर, समाधानपूर्ण होना देखा जाता है।
5. विवाह संस्कारोत्सव :- संबंधों को पहचानना ही संस्कार है। ऐसे संबंध अस्तित्व संबंध, मानव संबंध और नैसर्गिक संबंध के रूप में जानना और पहचानना जागृत मानव में स्वाभाविक क्रिया है। अस्तित्व संबंध सहअस्तित्व के रूप में, नैसर्गिक संबंध जल, वायु, वन, धरती के रूप में, मानव संबंध अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में संबंधों को पहचानना एक आवश्यकता है। हर जागृत मानव में यह सार्थक होता है। मानव संबंध क्रम में पति-पत्नी संबंध एक संबंध है। ऐसे संबंध के स्वरूप कार्य के बारे में पहले ही सभी संबंधों के साथ आवश्यकता, लक्ष्य, उपयोगिता के संबंध में विश्लेषण और विवेचना कर चुके हैं।
यहाँ उत्सव के संबंध में स्वरूप प्रक्रिया को प्रस्तुत करना आवश्यक समझा गया है। विवाह संबंध में बंधु-बांधव, अभिभावक, मित्र, सुहृदय मनीषियों की सम्मति, प्रसन्नता, उत्साह के साथ निश्चयन होना इस संबंध संस्कारोत्सव की पूर्व भूमि है। उभय पक्ष के अभिभावक उत्सवित रहना सहज है। ऐसे पृष्ठभूमि के साथ विवाहोत्सव सम्पन्न होना मानव परंपरा में एक आवश्यकता है। क्योंकि संयत जीवन प्रणाली के लिये संबंधों का पहचान उसके निर्वाह के साथ उत्सवित रहना संस्कार का ही द्योतक है। संस्कार का परिभाषा भी यही ध्वनित करता है कि पूर्णता के अर्थ में सम्पूर्ण कृत, कारित, अनुमोदित, कायिक, वाचिक, मानसिक विधियों से सदा-सदा निर्वाह करने की स्वीकृति। यही संबंध की पहचान का तात्पर्य है। ऐसा संबंध निर्वाह सदा-सदा के लिये सुखद,