वर्तमान होने के कारण है। और विरोधाभास और विशेष तथा सामान्य जैसी विषमताओं का कोई गवाही नहीं है। ऐसा विरोधाभास मानव में क्यों आया और कैसे आया इसके उत्तर में पहले विदित कराया गया है कि मानव विभिन्न जलवायु में इस धरती में अवतरण होने और विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में परंपरा को (अर्थात् पीढ़ी से पीढ़ी) को सुदृढ़ बनाने के क्रम में विरोधाभास को ही धातु युग, राज्य और आस्था युग तथा विज्ञान युग में भी स्वीकारना हुआ या सीमित रहना हुआ या विवश रहना हुआ। यही सम्पूर्ण अनिष्ट जो बुद्धिमान मानव जान लिया है, जिसको अभी भी जानना शेष है ऐसे सभी अनिष्ट घटनाओं का कारण सिद्ध हुआ है। यही मानव में अभी तक की भय, प्रलोभन, आस्थाओं से संबंधित सम्पूर्ण मान्यताएँ है। इसी में श्रेष्ठता-नेष्ठता, ज्यादा-कम, विद्वान-मूर्ख, ज्ञानी-अज्ञानी जैसी वितण्डावाद बना ही है। यही विरोधाभास समस्याओें के रूप में मानव परंपरा में भुक्तभोगित स्थितियाँ है। वितण्डावाद और विषमताएँ किसी मानव को स्वीकार्य नहीं है। भले ही पंचमानव कोटि में से पशुमानव और राक्षस मानव क्यों न हो। विषमता दुष्टता की पीड़ा मानव को स्वीकार नहीं हुआ क्योंकि दुष्टता से, विषमता से सदा विरोध होते ही रहा। अब उसका निराकरण ही समाधान होना सहज है। समाधान, समृद्धि विधि से सम्पूर्ण विषमताएँ समाधान में परिवर्तित होने का मार्ग प्रशस्त होता है जैसा प्रत्येक मानव समझदारी से समाधान श्रम से समृद्धि पूर्वक स्वायत्तता से समृद्ध होने से ही समाधानित होता है। यही परिवार मानव का स्वरूप भी है। यह चेतना विकास मूल्य शिक्षा संस्कार विधि से सर्वसुलभ होने की व्यवस्था मानवीय शिक्षा-संस्कार परंपरा का वैभव है। शिक्षा-संस्कार मानव परंपरा में अविभाज्य अभिव्यक्ति संप्रेषणा है। शिक्षा-संस्कार परंपरा का अभिव्यक्ति संप्रेषणाएं मानव जागृति का प्रमाण है। जागृति के प्रमाण का तात्पर्य स्वायत्त मानव के रूप में पीढ़ी से पीढ़ी समृद्ध बनाने से है। इससे स्पष्ट हो गया है कि शिक्षा-संस्कार का उद्देश्य स्वायत्त मानव के रूप में समृद्ध करने में सक्षम रहना है।
स्वायत्त मानव स्वयं के प्रति विश्वास, स्वयं में विश्वास का तात्पर्य व्यवस्था के रूप में जीने, समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने में विश्वास से हैं। श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, व्यवस्था में जीने और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने में समर्थ सभी व्यक्ति श्रेष्ठ हैं जो प्रमाण के रूप में प्रमाणित किये जा रहे हैं। ऐसे सभी के प्रति सम्मान होना स्वाभाविक है। यही तथ्य से श्रेष्ठता के प्रति सम्मान स्पष्ट है। इसे ऐसा भी कहा जा सकता है स्वयं जिस बात को चाहते हैं उन तथ्यों में प्रमाणित सभी व्यक्ति सम्मान के लिये पात्र हैं। ऐसे व्यक्तियों के प्रति सम्मान व्यक्त करने से हैं। सम्मान का तात्पर्य पूर्णता के अर्थ में स्वीकृति और मूल्यांकन सहित संप्रेषित हो पाना। संप्रेषणा का भी तात्पर्य पूर्णता के ही अर्थ में ही प्रस्तुत हो पाना बनता है। इसलिये सम्मान सहज श्रेष्ठता सर्वमानव में स्वीकृत