संस्कार से क्या फल, परिणाम, निष्पन्न हुआ है यह समीक्षित हो चुका है। जो मानव मानस में सर्वाधिक भाग नकारात्मक सूची के रूप में दिखाई पड़ता है। इसका भी नीर-क्षीर, न्याय अर्थात् स्पष्ट रेखाकरण इस प्रकार देखा गया है कि सामान्य आकांक्षा और महत्वाकांक्षा में सार्थक तकनीकी मानव सहज स्वीकृति के रूप में, सामरिक तंत्र और तकनीकी ह्रास विधि नियम रूपी विज्ञान अस्वीकृत है। जैसे विखण्डन विधि ह्रास की ओर पदों को इंगित करता है। जैसे परमाणु एक व्यवस्था के रूप में है उसके विखण्डन के अनन्तर वह एक व्यवस्था के रूप में दिखाई नहीं पड़ता है इसके विपरीत अनिश्चित गति से दिखना हो पाता है क्योंकि निश्चित गति परमाणु में ही दिखाई पड़ता है और परमाणु में एक से अधिक अंशों का होना पाया जाता है। निश्चित गति का तात्पर्य हर निश्चित संख्यात्मक परमाणु अंशों से गठित परमाणुओं का आचरण निश्चित रहने से है। इनमें कोई दुविधा नहीं रहती है। अतएव परमाणु के विखण्डन के उपरान्त परमाणु सहज व्यवस्था, अणु विखण्डन के उपरान्त अणु सहज व्यवस्था, अणु रचित रचनाओं के विखण्डन के उपरान्त उन-उन रचना सहज व्यवस्थाएँ दिखाई नहीं पड़ता है। इसका तात्पर्य यही हुआ, विखण्डन कार्य का उन्माद से ही व्यवस्था का विखण्डन होना सिद्ध हुआ। उन्माद इसलिये कहा गया कि जागृत मानव किसी व्यवस्था का विखण्डन करता नहीं। इतना ही नहीं हर जागृत मानव व्यवस्था का पोषक और संरक्षक, धारक-वाहक होना पाया जाता है। इस परीक्षित तथ्य के आधार पर हर मानव यह निश्चय कर सकता है कि विखण्डन विधि और कार्य मानव सहज मानवीयता का द्योतक नहीं है। इसी के साथ यह भी आवाज निश्चित रूप में मिलता है कि व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी ही मानव तथा मानवीयता का द्योतक है। इस विश्लेषणोंपरान्त पाये गये फल-परिणामों का मूल्यांकन से इस निष्कर्ष में आते हैं कि मानव समाज अपने अखण्डता और सार्वभौमता के अर्थ में स्वीकृत है और अपेक्षा बनी हुई है। अतएव इसका मूल स्रोत रूपी मानवीय शिक्षा संस्कार पक्ष मानवीयतापूर्ण व्यवस्था और मानवीयतापूर्ण आचरण रूपी सार्वभौम राष्ट्रीय चरित्र, नैतिकता और मूल्यों का अविभाज्य आचरण (संविधान) का स्वरूप और महिमाओं का आवश्यकता सूत्र पर आधारित विधि से अध्ययन करेंगे। क्योंकि अध्ययन से आचरण तक ही समाजशास्त्र का किंवा सम्पूर्ण शास्त्र का प्रयोजन और आवश्यकता स्वयं एवं सार्वभौम शुभ के रूप में तृप्ति और उसकी निरंतरता को पाना सहज समीचीन रहता ही है। इसलिये इसका अध्ययन और आचरण सुलभ है।
पहले नौ बिन्दुओं में इंगित किये गये तथ्यों का अध्ययन ही शिक्षा-संस्कार का सर्वसाधारण और आवश्यक स्वरूप है। अस्तित्व में सदा-सदा ही समाधान और सामरस्यता सहअस्तित्व सहज