को सुदृढ़ करते जायें तो प्रौढ़ावस्था में वह उपकारी हो ही जाता है। इतना ही हमको करना है शिक्षा में ये स्रोत को सार्थक बनाने की आवश्यकता एवं प्रावधान चाहिए जिसे मानवीय शिक्षा ही सार्थक बनायेगा। यांत्रिक शिक्षा एवं व्यवसायी शिक्षा इसे सार्थक बनायेगा नहीं। इस ओर ध्यानाकर्षण होने पर संभव है व्यवहार और व्यवस्था शिक्षा की ओर, प्रमाण शिक्षा की ओर आपकी प्रवृत्ति हो जाए। प्रमाण का आधार मनुष्य को होना है। यांत्रिक शिक्षा से, व्यवसायी शिक्षा से मानव सामाजिक होना तो बनेगा नहीं। इससे मानव के साथ अनाचार अत्याचार हो न हो किन्तु धरती के साथ अनाचार अत्याचार अवश्यंभावी है। यांत्रिक और व्यवसायी शिक्षा से यह धरती बर्बाद हुई है। अतः इसके विकल्प में मानवीय शिक्षा, व्यवहार शिक्षा, समाधान संपन्न शिक्षा, प्रमाण शिक्षा चाहिए। ऐसी शिक्षा के लिए मानवीयतापूर्ण आचरण को मध्य में रखा जाये। मानवीयता पूर्ण आचरण को संरक्षित करने के लिए मानव को समझदार बनाने के लिए संपूर्ण वांङ्मय तैयार किया जाये।

हमने देखा है मनुष्य आवेशात्मक और उत्तेजनात्मक कार्यों को तत्काल कर देता है। जहाँ कहीं भी समाधान, विवेक, प्रयोजनशील कार्य हैं उसे दस बार सोचता है तब करता है। बचपन में ऐसी प्रवृत्ति नहीं होती। बचपन के बाद जैसे-जैसे प्रौढ़ होता है वैसे-वैसे अपने में सहयोगवादी प्रवृत्ति पर शंका होने लगती है और प्राथमिकता क्रम में वह प्रवृत्ति नीचे आती जाती है। फलस्वरूप देर हो जाती है और जो समीचीन परिस्थिति थी वह बदल जाती है। बदले जाने पर और भी शंका होने लगती है और इस प्रकार सही बात हो ही नहीं सकता इस जगह पर आकर बैठ गया है आदमी। हम सही कर ही नहीं सकते यह निर्णय कर बैठ गया है मानव। दूसरी ओर मनुष्य व्यवस्था को चाहता है। व्यवस्था कैसे सर्वसुलभ हो सकता है लोक व्यापीकृत हो सकता है? इसके लिए यह प्रस्ताव है। मनुष्य को इसके लिए समझदार होना ही पड़ेगा। मनुष्य अपने में मानवीयतापूर्ण आचरण को हर आयाम, कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्यों में प्रमाणित करना ही व्यवस्था है इससे समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व फलवती होता है। इन्हीं फलों के लिए मानव चिरकाल से त्रस्त है, प्रतीक्षित है।

अभी मानव ने अपनी आवश्यकता को उपयोगी माना है दूसरे की आवश्यकता को उपयोगी नहीं माना। तभी तो एक आदमी दूसरे आदमी का, एक परिवार दूसरे परिवार का, एक समुदाय दूसरे समुदाय का, एक देश दूसरे देश का शोषण करता है। इन गवाहियों के आधार पर समझ में आता है कि मानव धर्म को, मानवीयतापूर्ण आचरण को हमें समझने पहचानने की आवश्यकता है और इसी शरीर यात्रा में चरितार्थ करने के लिए निष्ठा, साहसिकता जुटाना पड़ेगा। इसे संकल्प कहते हैं जो प्रमाणित होने के लिए निष्ठा जोड़ लेता है। व्यवस्था में जीने की निष्ठा प्रमाणिकता को अभिव्यक्त संप्रेषित करने के लिए निष्ठा। तीसरे

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