• स्वविध्वंस क्षमता विकास की कसौटी मानी जा सकती है? क्या यह क्रूरता का द्योतक नहीं है? क्या क्रूरता, अखंड सामाजिकता राष्ट्रीयता हो सकती है? क्या यह दानवीयता नहीं है? क्या दानवीयता ही विकास है? यह सब प्रश्न अपने आप उभर कर आते हैं। साथ यह बात भी स्मरण में आती है कि क्या राष्ट्र व राज्य के विकास एवं विकासशीलता की सम्पत्ति, सामग्री, उद्देश्य एवं आदर्श क्रूरता हो सकती है? यदि हां तब उसके साथ और दो तत्व हीनता एवं दीनता अवश्यंभावी हैं हीनता का तात्पर्य विश्वासघात से एवं दीनता का तात्पर्य अभाव एवं अक्षमता से है। यदि हीनता, दीनता एवं क्रूरता राज्य एवं राष्ट्र की मानसिकता होती तो क्या सामाजिक व्यवस्था एवं उसके कार्यक्रम कभी सफल हो सकते हैं? इन तमाम प्रश्नों के उत्तर में प्रत्येक सामान्य व्यक्ति का उत्तर नकारात्मक ही होगा। ऐसी स्थिति में सामाजिकता का क्या आधार रहेगा? मानव की मानसिकता ही उसके निर्माण का मूल आधार होती है। यदि किसी मानव या राष्ट्र की मानसिकता के मूल में छल, कपट, दम्भ, पाखंड, द्रोह-विद्रोह, वध-विध्वंस अथवा स्वयं के लिये अति भोग या बहुभोग रहा हो तो उस राष्ट्र या सनाज का अंतिम परिणाम स्वयं या अन्य के लिये क्लेश श्रृंखला के अलावा और क्या हो सकता है? यह सत्र भौतिकवादी अर्थप्रधान चिन्तन एवं व्यवस्था का अब तक का परिणाम रहा है।
  • भौतिकवादी अथवा भोग-परक चिन्तन प्रकृति के विकास क्रम को मानते हुए गठनपूर्णता, किया पूर्णता एवं आचरणपूर्णता अर्थात चैतन्य प्रकृति के सम्यक अध्ययन की मानसिकता निर्मित करने में समर्थ नहीं रहा है। जिसके फलस्वरुप समाज <a id="_Hlk217323856"></a>मूल्य एवं जीवन मूल्य का समुचित अध्ययन नहीं हो पाया है। इसी सत्यतावश ननुष्य को जड़ प्रकृति अर्थात् रासायनिक अथवा भौतिक परिणाम एवं परिवर्तन की सीमा में विश्लेषण करते हुए यांत्रिक जीवन के लिये बाध्य किया है। मनुष्य का स्वभाव से ही संवेदन एवं संज्ञानशील होने के कारण यंत्रवत जीवन तक सीमित रह सकना संभव नहीं हो रहा है और उस घुटन से बाहर निकलने के लिये छटपटा रहा है। साथ ही स्वस्थ दिशा व मार्ग के लिये प्रतीक्षारत है।

अधि भौतिकवादी (धर्मप्रधान) व्यवस्था की असफलता-अधिभौतिकवादी धर्म प्रधान चिन्तन व व्यवस्था ने रहस्य पर आधारित पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक एवं मोक्षवादी प्रलोभन या भय की मानसिकता को निर्मित किया। साथ ही मोक्ष या निवृत्तिवादी मानसिकता के अतिरिक्त स्वर्ग व पुण्य के फल में भोग प्राप्ति का प्रलोभन अथवा उसके विनरीत में भोग के अभाव होने के साथ प्रताड़न-भय की मानसिकता को निर्मित किया। इतना ही न होकर अर्थात् उच्चांग स्थितियाँ अर्थात मोक्ष कैवल्य, सहज-अवस्था एवं साक्षात्कार के लिये भी रहस्य का आवरण बना ही रहा। इसी रहस्यमयता-वश अधिभौतिक या धर्म प्रधान व्यवस्था के अन्तर्गत निर्मित मानसिकता के अन्तर्गत आने वाले मानव समाज में आत्म निर्भरता के स्थान पर एक सर्वशक्तिमान रहस्यमय इकाई पर पराश्रित रहने की मानसिकता को तैयार किया। इसी पराधयी भावना या मानसिकता ने मानव को परम्परा का दास बनाया एवं इसके कारण पुरुषार्थ तथा स्वअस्तित्व के प्रति गौरवपूर्वक साहसिकता विकसित नहीं होने पाई। इस प्रकार अधिभौतिकवादी या धर्मप्रधान चिन्तन प्रकृति के विकासक्रम में मानव जीवन, जीवनी क्रम एवं जीवन के कार्यक्रम को विश्लेषण पूर्वक विकसित करने में समर्थ नहीं रहा है।

Page 2 of 106
-1 1 2 3 4 5 6 7 8