2. प्राचीन ज्ञान-विज्ञान मध्यस्थ दर्शन, सह-अस्तित्ववाद व जीवन विद्या
आज हम हर एक पहलुओं में पराभव की ओर जा रहे हैं। हम आज जितने सामर्थ्यशाली हैं कल और कम, आज जितने सामाजिक हैं, कल असामाजिक, आज जितनी व्यवस्था है कल और कम व्यवस्था में पाते हैं। आज से कल बदतर की ओर ही चल रहे हैं, अर्थात् यह कहें तो ठीक होगा की मानव सामाजिक रूप में असामाजिक, आर्थिक रूप में विपन्न एवं राजनैतिक स्थिति में अंधकार में चलते चला जा रहा है। राजनैतिक विफलता को द्रोह, विद्रोह, शोषण और युद्ध के रूप में हम देख पाते हैं। सामाजिक रूप में जो हम देखते हैं वह अनेक जाति, पन्थ और सामाजिक चेतना कट्टरता की तरफ जा रही है। आर्थिक रूप से आज किसी एक को दो के साथ लाने का प्रयास करते हैं तो कल उसे 10 और 2 के अनुपात में पाते हैं। 10 और 2 को एक साथ लाने का प्रयत्न करते हैं तो 100 और दस के अनुपात में हो गया। और आगे बढ़े तो असमानता ही बढ़ी। इसके कारण में पाया गया कि व्यापार चेतना और नौकरी की चेतना मनुष्य को आर्थिक असमानता की ओर दौड़ा रहा है। अनेक जाति, पंथ, सम्प्रदाय मनुष्य को कट्टरता की ओर दौड़ा रहा है। जिससे दिन प्रतिदिन मनुष्य जाति, भय व भ्रांति की ओर जा रहा है।
मेरा मूल उद्देश्य दर्शन को प्रस्तुत करना नहीं था, हमारा देश आज़ाद हुआ, सत्ता हस्तांतरित हुई। सत्ता पर अपने जन बैठे। जन प्रतिनिधि बने। हमारा संविधान राष्ट्र चरित्र क्या है? इसे स्पष्ट नहीं कर पाया, इस मूल तत्व से मुझे चोट लगी, जिज्ञासा जागृत हुई, यह जानने व समझने की कि राष्ट्रीय चरित्र क्या है? अस्तित्व कैसा है? अस्तित्व में मानव कैसा है? मनुष्येत्तर प्रकृति कैसी है? व्यवहार में देखने लगा, एवं जब वाङ्गमय रूप देने लगा तो वह मध्यस्थ-दर्शन बन गया, सह-अस्तित्ववाद हो गया। योजना बनने लगी। मेरी संवेदनशीलता कहिए या अनन्त की कृपा कहिए, किसी योग या संयोग से ही किसी तीसरी वस्तु का जन्म होता ही है। अनंत से हमारा संबंध है ही, इसे बाद में कहूंगा| भारतीय संविधान में राष्ट्रीय चरित्र पहचाना जा सकता है, यह विश्वास उत्पन्न हुआ। एक भाग संक्षिप्त रूप में पूरा हुआ।
दूसरा भाग -
मनुष्य अभी तक दो प्रकार से घूमा - प्रथम तो ईश्वर को बीच में लाया। रहस्यमूलक ईश्वरीय चिंतनज्ञान को हम ज्ञान मानते आये, इसके आधार पर मनुष्य ईश्वर से सब कुछ होने की बात को माना, फलस्वरूप ईश्वर को केन्द्र मान कर हर बातों में हम सत्य को खोजने लगे। इसके लिये अनेकानेक विभूतियां अपने को प्रयोग किये, अर्पित किये, एवं ख्याति भी पाये, जिन्हें हम आदर्श पुरुष मानते हैं। इससे दो प्रकार का चरित्र का जन्म हुआ (जिन्हें आप भी श्रेष्ठ मानते हैं (1) भक्तिवादी चरित्र (2) विरक्तिवादी चरित्र। ये दोनों ही चरित्र शिक्षा एवं व्यवस्था का आधार या सूत्र नहीं बन पाये। फलस्वरूप ये व्यक्ति के सीमा में ही रह गया या व्यक्ति को जितना भी संसार, लोक, स्वयं श्रेष्ठ माना, इससे कहीं-कहीं तृप्ति मिलती रही। सर्वाधिक प्रयासों के बाद जिन महापुरुषों को हम पहचाने, समझे या माने उनसे हमें शिक्षा और व्यवस्था का कोई सूत्र नहीं मिला, और राष्ट्रीय चरित्र नहीं बन पाया।