• विकल्प की आवश्यकता ५-IV इन ऐतिहासिक प्रयोगों एवं उनके परिणामों से स्पष्ट होता है कि धर्म एवं अर्थपरक चिन्तनों पर आधारित व्यवस्थायें मानव समाज पर प्रयोग के द्वारा व्यर्थ सिद्ध हो चुकी हैं। अस्तु विकल्प के रूप में एक स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था की अनिवार्यता की अनुभूति वर्तमान विश्व-समाज को हो रही है जिसमें समाधान, स‌द्धि, अभय एवं सह-अस्तित्व सर्व सुलभ हो सके। ऐसी व्यवस्था मानवीयता पूर्ण सह अस्तित्ववादी चिंतन पर आधारित होगी जिसके लिये जड़ व चैतन्य प्रकृति की क्रियाशीलता का अध्ययन एक अनिवार्य तथ्य है। क्योंकि मनुष्य जड़ व चैतन्य का संयुक्त साकार रुप है।
  • चैतन्य प्रकृति की विशेषता :
  • चैतन्य पद, प्रकृति के विकासक्रम में पाया जाने वाले एक तथ्य है। जड़ प्रकृति का परमाणु ही विकास पूर्वक अथवा गठनपूर्णता पूर्वक चैतन्य पद अथवा जीवन पद को पाता है। फलतः अमरत्व सिद्ध होता है। साथ ही अक्षय शक्ति सम्पन्न होता है। इस प्रकार जीवनता एकअनुस्यूत प्रक्रिया सिद्ध होती है। इससे स्पष्ट होता है कि जीवन नित्य जन्म-मृत्यु घटना मात्र है। इसी चैतन्य जीवन के क्रम में जीवन का समस्त कार्यक्रम समाया है। जीवन एवं जीवन के कार्य-क्रम के ज्ञापन, प्रकाशन, व्यवहार एवं संस्कार की प्रक्रिया ही संस्कृति या सभ्यता है। अस्तित्वपूर्वक जन्म द्वारा जीवन ही जीवात्मा एवं ज्ञानात्मा के पद या रुप में प्रकाशित है। जीवन की निरन्तरता जन्म घटना का मूल कारण है। जीवन के अभाव में जन्म का होना नहीं पाया जाता है। जीवन पद प्रतिष्ठा परमाणु में गठन पूर्णता से विकसित होती है। गठनपूर्णता का तात्पर्य परमाणु में समाने योग्य सभी अंशो के समा जाने से है यह घटना परमाणु के स्वभाव गति तथा वातावरण के दबाव व देय के योगफल में होती है। प्रत्येक इकाई के लिये स्वभाव गति प्रतिष्ठा में ही उसके विकास की संभावना अत्यंत, सन्निहित या उदित होती है। इसी क्रमिक विकास में जड़ चैतन्यात्मक प्रकृति प्रकट है। जड़ प्रकृति के परमाणु में प्रस्थापन, विस्थापन के साथ रुप और गुणो में परिवर्तन होता है जिसका परिमाणित होना पाया जाता है।
  • इससे स्पष्ट होता है कि जड़ प्रकृति में मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन होता है जबकि चैतन्य प्रकृति में केवल गुणात्मक परिवर्तन का क्रम पाया जाता है जिसका परिमाण नहीं होता है जैसे-आशा, विचार एवं संकल्प में परिवर्तन के साथ कोई मात्रात्मक परिवर्तन नहीं होता है जो बच्चों से बड़ों तक में देखा जा सकता है। भ्रम का ज्ञान होने एवं उसका सुधार करने का ज्ञान व अधिकार गुणात्मक परिवर्तन है जो मानव के लिये एक सहज संभावना है। इसे मनुष्य के लिये सहज, सुलभ व सार्थक बनाने की दिशा में मनुष्य अध्ययन, अध्यापन, प्रयोग, संयोजन, योजन, संधान एवं अनुसंधान कार्य में रत है। इस क्रम में मनुष्य अस्तित्व प्रतिष्ठा से व्यवहार प्रतिष्ठा तक विधिवत अध्ययन करना चाहता है। विधिवत अध्ययन का तात्पर्य वस्तु स्थिति, वस्तुगत एवं स्थित सत्य में निर्भ्रमता के रूप में स्पष्ट है।
  • वस्तुस्थिति सत्य - देश, काल एव दिशा के ज्ञान में चरितार्थ होता है।
  • वस्तुगत सत्य - रूप, गुण, स्वभाव एवं धर्म के ज्ञान में होता है।

स्थिति सत्य सत्ता - में सम्पृक्त प्रकृति (अस्तित्व समग्र) के ज्ञान में होता है।

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